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4PM की मुस्लिम महिला पत्रकारों पर दिल्ली पुलिस की…

4PM की मुस्लिम महिला पत्रकारों पर दिल्ली पुलिस की

4PM की मुस्लिम महिला पत्रकारों पर दिल्ली पुलिस की

Ali Aadil Khan Editor’s Desk

“सत्ता से सवाल पूछना गुनाह है, क्या मुख्यमंत्री या ग्रह मंत्री देश के क़ानून से ऊपर है ? क्या पत्रकार का सवाल पूछना VVIP सुरक्षा में बाधा है ? सत्ता से सवाल पूछना अगर गुनाह बन जाए तो शासक निरंकुश हो जाता है और निरंकुश शासक हलाकू और चंगेज़ बन जाता है जो सिर्फ विनाश और तबाही का निशाँ होता है .

4PM की पत्रकार शाहीन और नफीसा का मामला अब लोकतंत्र VS तानाशाही की बहस का केंद बन गया है. दिल्ली में एक बार फिर बड़ा सवाल पुलिस की लाठी से नहीं…लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा है।

दरअसल पुलिस को संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के साथ नागरिकों की सुरक्षा , और समाज को बे ख़ौफ़ तथा Peaceful रखने केलिए बनाया गया था, और ऐसी आशा भी की जाती है.

लेकिन जब कुछ नफरती और हिंसक प्रवृति के पुलिस कर्मी और अधिकारी खाकी , काली या सफ़ेद वर्दी में Biased होकर कार्रवाई करते हैं तो बदनाम भी पूरी वयवस्था होती है पूरा विभाग होता है, इसके बाद पुलिस के क़ाबिल और वफादार अफसरों और कर्मचारियों को भी जनता भक्षक के रूप में ही देखती है.

4PM की पत्रकार शाहीन और नफीसा द्वारा मुख्यमंत्री से सवाल पूछना आखिर इतना बड़ा जुर्म कैसे बन गया कि उन दोनों को थाने लाकर पीटा गया, धर्म सूचक शब्दों का प्रयोग किया गया ? सवाल यह है कि CM से सवाल करना अपराध है या सत्ता को निरंकुश छोड़ देना .?

सभी छोटे बड़े youtubers और सोशल मीडिया channels दुखद घटना को पुलिस द्वारा सत्ता के कहने पर मुस्लिम नफरत के एंगल से दिखा रहे हैं, आप ऐसे दर्जन भर से ज़्यादा मुस्लिम पत्रकारों को जानते होंगे जो गोदी मीडिया में काम कर रहे हैं उनके खिलाफ कभी पुलिस की ज़्यादती की कोई घटना देखने को नहीं मिली तो फिर 4PM की पत्रकारों पर यह क़हर क्यों टूटा?

हमको इसका Angle 4PM vs सत्तापक्ष का लगता है. 4PM के मालिक संजय शर्मा और उनके सभी पत्रकार सत्ता से लगातार सवाल पूछकर अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं वहीँ सत्ता उनके इस ज़िम्मेदारी को अपना अपमान समझ रही है. और इसको एक चुनौती के रूप में देखती है ….इसीलिए 4PM Channel और उसके मालिक संजय शर्मा पर गाज गिरती ही रहती है …

मामला दिल्ली के साकेत इलाक़े का है जहाँ एक Private Hospital के उदघाटन के कार्यक्रम में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहुंचे थे. पहला सवाल तो एहि है कि स्वास्थ्य मंत्री क्यों नहीं आये गृहमंत्री का इससे क्या सम्बन्ध था ? खैर इस कार्यक्रम को कवर करने 4PM न्यूज़ नेटवर्क से जुड़ी पत्रकार शाहीन खान और नफ़ीसा खान पहुंची थीं।

पीड़ित महिला पत्रकारों का आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री से सवाल पूछने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने उन्हें रोका, हिरासत में लिया और साकेत थाने किसी मुजरिम की तरह ले गए । पत्रकारों ने थाने में मारपीट के गंभीर आरोप लगाए और उनके शरीर पर चोटों के निशान पूरे देश ने भी देखे। इसमें तो कोई धोखा या manipulation हो ही नहीं सकता.

लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी सामने आना चाहिए, जहाँ दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। दक्षिण दिल्ली के DCP अनंत मित्तल के मुताबिक, पत्रकारों को VVIP रूट बाधित करने के कारण थोड़े समय के लिए हिरासत में लिया गया था।

पुलिस का कहना है कि रास्ता खुलने के बाद उन्हें जाने के लिए कहा गया, लेकिन वहां विवाद हुआ। पुलिस ने मारपीट के आरोपों को “तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक” बताया है। हालांकि चोट के निशाँ तो साफ़ दिखाई दे रहे हैं …

अगर पुलिस के इस दावे को थोड़ी देर के लये सही मान लिया जाए —तो क्या पत्रकारों ने VVIP रूट बाधित किया? अगर किया था—तो क्या उसकी CCTV फुटेज मौजूद है? क्या पुलिस के पास पूरा घटनाक्रम रिकॉर्ड करने वाले कैमरों की फुटेज है?

क्या उसको अपनी original Form में सामने लाया जाएगा ? अब इसके लिए SIT बनेगी जांच होगी और उसपर Review होगा ….आपको क्या लगता है क्या सब कुछ न्यायसंगत होगा ईमानदारी से होगा ? अब तक जितनी SIT और आयोग बने उनके नतीजे क्या निकले सब जानते हैं …

और सबसे अहम बात यह है कि —थाने के अंदर महिला पत्रकारों के साथ जो कुछ हुआ उसको DCP के सिर्फ एक बयान से खारिज नहीं किया जा सकता। इसलिए इस पूरे मामले को धार्मिक नज़रिये से देखना या भावनाओं से ज्यादा जरूरी है—एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच और दोषी पुलिस वालों का suspension …

यह पूरा मामला और भी ज़्यादा गंभीर तब हुआ जब पुलिस कर्मियों पर महिला पत्रकारों को लाठियों से मारने का आरोप लगा। पत्रकार शाहीन खान का दावा है कि पुलिसकर्मियों ने उनकी पहचान और धर्म के बारे में सवाल किए और उन्होंने आरोप लगाया कि ‘खान’ नाम सामने आने के बाद उनके साथ कथित दुर्व्यवहार और बढ़ गया।

पत्रकार शाहीन खान ने बताया SHO ने उनसे कहा कि तुम्हारे ऊपर इतने Case लगा दूंगा कि ज़िंदगी भर परेशां रहना पड़ेगा. हालाँकि पुलिस ने इन आरोपों को भी खारिज किया है।

अगर यह आरोप सही है, तो मामला सिर्फ एक पत्रकार और पुलिस के बीच विवाद का नहीं रह जाता। फिर सवाल उठेगा—क्या कानून की नजर में नागरिक की पहचान बदलते ही पुलिस का व्यवहार भी बदल सकता है?

और अगर आरोप गलत है, तो फिर जांच के जरिए यह बात भी साफ होनी चाहिए। क्योंकि पत्रकार का नाम खान हो, शर्मा हो, यादव हो, गौतम हो ,सिंह हो या कोई और—इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता !!! पुलिस के सामने उसकी पहली पहचान एक नागरिक और एक पत्रकार के रूप में ही रेहनी चाहिए ।

और यहां मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से भी सवाल बनता है। मुख्यमंत्री लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवालों से ऊपर या या क़ानून से बाहर नहीं होतीं। उनको भी यह बात जनता की प्रतिनिधि के रूप में ज़हन में रखना होगी .

पत्रकार का काम मुख्यमंत्री की तारीफ करना नहीं है। पत्रकार का काम सवाल पूछना है। सवाल तीखा हो सकता है।
सवाल असहज कर सकता है। सवाल सरकार के विरोध में हो सकता है , सवाल नेता को नापसंद हो सकता है।

लेकिन पद की गरिमा और लोकतंत्र का सम्मान यह है कि या तो तथ्यात्मक जवाब हो या फिर खामोशी!! एक महिला के रूप में 2 महिला पत्रकारों पर होने वाले ज़ुल्म पर मुख्यमंत्री को अपनी प्रतिक्रया देते हुए दोषी पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई कि बात तो करनी चाहिए थी या कम से कम जांच के आदेश देने कि बात करनी चाहिए थी . वीडियो बनाने तक ऐसी कोई खबर नहीं है….

लेकिन लोकतंत्र में असहज सवाल का जवाब पुलिस का अत्याचार किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं हो सकता। यह कायरता , शासन और प्रशासन की असफलता का संकेत है और खम्बा खसोटने वाली मिसाल भी .

और अगर पत्रकार ने नियम तोड़ा है, VVIP सुरक्षा में बाधा डाली है या पुलिस के निर्देशों की अवहेलना की है, तो कानून अपना काम करे—लेकिन पुलिस इन्वेस्टीगेशन के नाम पर किसी भी तरह की मारपीट की अनुमति न तो संविधान देता है, न क़ानून और न ही मानवता। ये तो महिलायें भी थीं और पत्रकार भी , किसी आम नागरिक पर भी ऐसी कार्रवाई आपत्तिजनक और शर्मनाक है और निंदनीय है.

इस मामले में हमें न तो पत्रकार के आरोपों को बिना जांच के अंतिम सत्य मानना चाहिए…न पुलिस के खंडन को अंतिम सच। और न ही VVIP सुरक्षा में पत्रकारों द्वारा बाधा डालने के आरोप को सही बल्कि फैसला सुबूतों के आधार पर होना चाहिए।

थाने की Original फुटेज, महिला पत्रकारों की मेडिकल रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, इन सबके आधार पर फैसला अदालत निष्पक्ष तरीके से लेगी ऐसी हमारी आशा है . और अगर किसी भी पुलिसकर्मी ने कानून की सीमा लांघी है तो उसके खिलाफ सख्त और उचित कार्रवाई भी जल्द होनी ही चाहिए।

और अगर पत्रकारों ने कानून या सुरक्षा व्यवस्था का उल्लंघन किया है—तो वह भी साफ-साफ जनता के सामने आना ज़रूरी है, ताकि आइंदा ऐसी घटना से बचा जा सके । क्योंकि न पत्रकार कानून से ऊपर है, न पुलिस और न सत्ता में बैठे मंत्री या मुख्यमंत्री कानून से ऊपर है।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है—कि सत्ता से सवाल पूछने वाले की आवाज कितनी सुरक्षित है…और जवाब देने वाली व्यवस्था कितनी ईमानदार और जवाबदेह है। दिल्ली पुलिस को भी यही साबित करना है कि वह सत्ता की सुरक्षा भर नहीं, कानून और नागरिक अधिकारों की भी प्रहरी है।

और सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि सत्ता में बैठे जनता के सेवार्थियों से सवाल पूछने वाला पत्रकार अगली बार सवाल पूछने को अपना गौरव समझे चुनौती नहीं…….क्योंकि…सत्ता से सवाल करने वाला पत्रकार लोकतंत्र का दोस्त है — और सवालों से भागने वाली व्यवस्था लोकतंत्र की दुश्मन , इसके बाद फैसला आपका , आप किसको सही ठहराते हैं, अपनी राय ज़रूर दें।

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