प्रेस विज्ञप्ति
जमीयत उलमा-ए-हिंद और आमसू की याचिका पर नोटिस के बावजूद केंद्र और असम सरकार ने जवाब दाखिल नहीं किया, सुप्रीम कोर्ट ने छह सप्ताह का समय दिया
मौजूदा राज्य सरकार राजनीतिक लाभ के लिए नागरिकता के मुद्दे को लगातार जिंदा रखना चाहती है : मौलाना अरशद मदनी
एनआरसी की प्रक्रिया को कानूनी अंजाम तक पहुंचाना असम में शांति और सद्भाव के लिए जरूरी : जमीयत उलमा-ए-हिंद
नई दिल्ली, 10 अगस्त 2026। असम में अंतिम एनआरसी के लागू होने और उसमें शामिल नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किए जाने से संबंधित जमीयत उलमा-ए-हिंद और आमसू की ओर से एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड फ़ुज़ैल अहमद अय्यूबी के माध्यम से दाखिल महत्वपूर्ण याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एस.एम. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की दो सदस्यीय पीठ ने की।
हालांकि, केंद्र और असम सरकार को नोटिस जारी होने के बावजूद अभी तक जवाब दाखिल नहीं किया गया है। इस पर अदालत ने मामले की सुनवाई छह सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
जमीयत उलमा-ए-हिंद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि नोटिस जारी होने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकार ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। अब उन्हें अपना पक्ष, आपत्ति और जवाब अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को यह भी बताया कि भारत के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जमीयत उलमा-ए-हिंद की याचिका पर जवाब दाखिल किया जा चुका है। इसके जवाब में जमीयत उलमा-ए-हिंद की ओर से जल्द ही री-ज्वाइंडर दाखिल किया जाएगा।
उन्होंने अदालत का ध्यान इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर भी दिलाया कि अंतिम एनआरसी प्रकाशित हुए छह वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इसमें शामिल लोगों को अभी तक राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी नहीं किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में आज हुई सुनवाई पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि नोटिस जारी होने के बावजूद केंद्र और असम सरकारों द्वारा जवाब दाखिल नहीं करना और अंतिम एनआरसी के छह वर्ष बाद भी कानूनी प्रक्रिया पूरी न किया जाना इस आशंका को मजबूत करता है कि नागरिकता के इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझकर जिंदा रखा जा रहा है।
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि अतीत में इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर असम में सांप्रदायिक ताकतें मुसलमानों को विदेशी बताकर बहुसंख्यक समाज की नजरों में उनकी नागरिकता और हैसियत को संदिग्ध बनाने का प्रयास करती रही हैं। इसी कारण असम में सामाजिक स्तर पर लंबे समय तक सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बनी रही।
उन्होंने कहा कि चाहे पंचायत प्रमाणपत्र को बदलने का मामला हो, नागरिकता के लिए अंतिम तारीख निर्धारित करने का मामला हो या राज्य में मदरसों को बंद करने की कोशिश, जमीयत उलमा-ए-हिंद हर ऐसे अवसर पर पीड़ितों और प्रभावित लोगों के साथ मजबूती से खड़ी रही है और उनके मामलों को पूरी ताकत के साथ अदालतों में लड़ती आई है।
मौलाना मदनी ने कहा कि असम की मौजूदा राज्य सरकार भेदभाव और नफरत की राजनीति तथा मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर काम कर रही है और राजनीतिक लाभ के लिए नागरिकता के मुद्दे को लगातार जिंदा रखना चाहती है। यही वजह है कि अंतिम एनआरसी प्रकाशित होने के बावजूद नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने में जानबूझकर टालमटोल की जा रही है।
उन्होंने कहा कि असम में एनआरसी की प्रक्रिया को कानून के अनुसार पूरा करना राज्य में शांति और सामाजिक सद्भाव की बहाली के लिए बेहद जरूरी है। साथ ही यह समानता, भाईचारे और कानून के शासन जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए भी आवश्यक है।
गौरतलब है कि जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के मार्गदर्शन और संरक्षण में जमीयत उलमा-ए-हिंद असम के अध्यक्ष मौलाना मुश्ताक अनफर के नेतृत्व में एनआरसी और पंचायत प्रमाणपत्र, धारा 6A सहित कई महत्वपूर्ण मामलों को पिछले 14 वर्षों से अदालतों में मजबूती से लड़ा जाता रहा है और इसमें सफलता भी मिली है।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अनुसार, असम का मामला बेहद संवेदनशील रहा है। यदि सांप्रदायिक तत्व अपने उद्देश्य में सफल हो जाते तो एक अनुमान के अनुसार लाखों मुसलमानों की नागरिकता खतरे में पड़ सकती थी।
आज सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान जमीयत उलमा-ए-हिंद असम के अध्यक्ष मौलाना मुश्ताक अनफर, मौलाना कलीमुद्दीन, आमसू के अध्यक्ष तथा अन्य पदाधिकारी भी मौजूद रहे।
फजलुर्रहमान क़ासमी
प्रेस सचिव जमीयत उलमा-ए-हिंद

