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फ़लस्तीन की दास्ताँ

फ़लस्तीन की दास्ताँ

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Ali Aadil Khan Editor’s Desk

Episode 1

मज़हबी हक़ाइक़ , और मज़हबी पेशन गोइयाँ जो हैं वो सर आँखों पर , और तारीखी पसे मंज़र में भले ये हालात आना तय कहा जाता हो जो इस वक़्त ज़मीन पर रूनुमान हैं , लेकिन एक Anylist और गय्यूर सहाफी की नज़र से में अपना नज़रिया आपके सामने रख रहा हूँ .इसका मक़सद किसी मज़हब क़ौम या सम्प्रदाय के जज़्बात या भावनाओं को ठेस पहुँचाना हरगिज़ नहीं है . बल्कि जो सच्चाई पहले से दुनिया के अहले नज़र , मुंसिफ और ईमानदार लोग अपने articles , movies , या Viedeos में पेश कर चुके हैं उन्हीं हक़ाइक़ पर मब्नी अपनी राये इस vedio में रख रहा हूँ . दोस्तों इस vedio के 3 Episodes हैं , तीनो को लगातार देखने से ही आपको बात अच्छे से समझ आ सकेगी , लिहाज़ा आपसे गुज़ारिश है तीनो Episodes को देखें और अपनी राये ज़रूर कमेंट बॉक्स में डालें

खून अब लाल कर देगा ज़मीन को !!!


ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे
फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे या पा-ए-सलासिल पे जमे
तेग़-ए-बे-दाद पे या लाशा-ए-बिस्मिल पे जमे
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा

लाख बैठे कोई छुप-छुप के कमीं-गाहों में
ख़ून ख़ुद देता है जल्लादों के मस्कन का सुराग़
साज़िशें लाख उड़ाती रहीं ज़ुल्मत की नक़ाब
ले के हर बूँद निकलती है हथेली पे चराग़
ज़ुल्म की क़िस्मत-ए-नाकारा-ओ-रुस्वा से कहो
जब्र की हिकमत-ए-परकार के ईमा से कहो
महमिल-ए-मज्लिस-ए-अक़्वाम की लैला से कहो
ख़ून दीवाना है दामन पे लपक सकता है
शोला-ए-तुंद है ख़िर्मन पे लपक सकता है
तुम ने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा
आज वो कूचा ओ बाज़ार में आ निकला है
कहीं शोला कहीं नारा कहीं पत्थर बन कर
ख़ून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से
सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से
ज़ुल्म की बात ही क्या ज़ुल्म की औक़ात ही क्या
ज़ुल्म बस ज़ुल्म है आग़ाज़ से अंजाम तलक

ख़ून फिर ख़ून है सौ शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें कि मिटाओ तो मिटाए न बने
ऐसे शोले कि बुझाओ तो बुझाए न बने
ऐसे नारे कि दबाओ तो दबाए न बने

— साहिर लुधियानवी

दोस्तों फलस्तीन की दर्द भरी तारिख को हर वो शख्स जानना चाहता है जो ज़रा भी अपने सीने में इंसानियत का दर्द रखता है .फलस्तीनियों पर दशकों से होने वाले सहयोनि मज़ालिम शायद क़यामत बुलाकर ही रहेंगे , दुनिया में इंसाफ़ की शायद अब कोई रमक़ बाक़ी नहीं रही ,या होसकता है कहीं हो ,,,, कुछ ग़ैरतमन्द इंसानों को यक़ीनन ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ लगाने में सुकून महसूस होता है और अक्सर हुक्मरान और इंसान ख़ामोशी को हिकमत समझकर मुत्मइन रहते हैं . लेकिन मज़लूम के आंसू धरती को कब खून से लाल करदें और कब इंसानी नाशों की मीनार बनादें और ढेर लगा दें कोई नहीं जानता .

दरअसल ज़ुल्म और ना इंसाफ़ी पर अवाम की खामोशी का खुद अवाम को ही बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है जिसको आज दुनिया अच्छे से शायद महसूस कर सकती है .आज मरने वालों में ज़ालिम इक्का दुक्का है अक्सर नेक और ग़रीब तथा माध्यम वर्गी आम इंसान हैं , लेकिन इनकी खामोशी इनका क़ुसूर बन क्र निगल गयी ,,,,,,अब जो ज़ालिम बचे हैं चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष या फिर उनके सहयोगी उनपर तो बाहर भयानक हालात आने वाले हैं थोड़ा सा इंतज़ार करो …..

ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा

दुनिया और अरब देशों के हुक्मरानों की फलस्तीन और इस जैसे कई और मज़लूम देशों के लाखों अवाम के क़त्ल इ आम और उनकी बेबसी पर खामोशी और बेहिसी उनके नुज़ूल (Downfall) और आसमानी बालाओं के आने की बड़ी वजह बानी है .

सऊदी अरब के इसराइल के साथ नए मुआहदे और pacts ,,,,मज़लूमों के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के मुतरादिफ़ है . कुछ फलस्तीनियों को पनाह देकर और उनको राशन देकर अरब मुमालिक अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछा नहीं छुड़ा सकते .यह तो इंसानी जज़्बे के साथ सभी मुल्क करते हैं .

इमानी तक़ाज़ा तो यह था ज़ुल्म के ख़िलाफ़ मज़बूत आवाज़ उठाते और ज़ालिम कोई भी हो अपना हो या पराया हो उसको ज़ुल्म से रोकना हुकूमतों की ज़िम्मेदारी होना चाहिए , और मज़लूम को इन्साफ दिलाने के लिए ज़ालिम से आखरी सांस तक जंग करना चाहिए , मगर वहां तो ज़ालिमों के साथ दोस्ती के हाथ बढ़ाये जा रहे हैं ……
आज के अरब रहनुमाओं के लिए शायद ये Appropriate है ….

जिन को आता नहीं दुनिया में कोई फन , तुम हो
नहीं जिस क़ौम को परवाह -इ -नशेमन , तुम हो
बिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो खिरमन , तुम हो
बेच खाते हैं जो इस्लाफ़ के मद्फ़न , तुम हो
हो नको -नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर के
क्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पथर के

फलस्तीन की मुख़्तसर तारिख पर एक नज़र

15 मई फलस्तीन के लिए एक ख़ास तारिख है ,15 मई वह तारीख है जो हम सबको याद रहनी चाहिए. इसलिए कि दुनिया की बड़ी आबादी है जिसके दिल पर यह ज़ख्म की तरह है. फिलीस्तीनी इसे आपदा के दिन के तौर पर याद रखते हैं: यानी नकबा .नकबा डे, यानी सहयोनि ज़ुल्मों को याद कर के फ़िलिस्तीन की आज़ादी की जंग जारी रखने की प्रेरणा का दिन

यह लफ्ज़ हर जुबान की लुग़त यानी (Dictionary ) में दाखिल किया जाना चाहिए , क्योंकि यह शब्द हमें खबरदार रखता है इस बात से कि एक आबादी का बसना दूसरी आबादी के उजड़ने की वजह न बने,यह हमारा फर्ज था जिसको हमने निभाया नहीं है…… कम से कम याद तो रखें |

नकबा लफ्ज़ हमसे मांग करता है की दुनिया में जहाँ कहीं पूरी आबादी या उसका एक हिस्सा नज़रबंद या कैद हो,,,,, या जिलावतन रहने को मजबूर किया गया हो….. तो इसे हम सभी अम्न पसंद इंसानो को एक आपदा के रूप में देखना चाहिए , और इसके समाधान के लिए तुरंत कोई लाहे अमल तैयार होना चाहिए कोई Strategy बननी चाहिए , लेकिन अफ़सोस ! ऐसा हम नहीं करते.अब चाहे वो फलस्तीनियों के case में हो या फिर कश्मीरियों के lockdown के मामले में .या फिर दुनिया में कहीं भी किसी भी मज़हब के इंसानो के अधिकारों के हनन की बात हो .

इस लिए नकबा को याद रखना ज़रूरी है,,,,,,,. यूरोप , रूस और अरब से निकाले गए यहूदियों ने फिलस्तीनियों के साथ खुद वही किया, जो उनके साथ किया गया था , हालाँकि वो यहूदियों की अपनी शैतानी और नफरती हरकतों के चलते वुजूद में आया था , वो बदअमनी के हालात पैदा करने की साज़िशें रचते रहते थे . मरी हुई इंसानियत का नमूना पेश कर रही है यह यहूदी क़ौम ,,,,और याद रखें इस ज़ुल्म पर खामोश रहने वाले भी कल इंसाफ़ के दिन इन्ही ज़ालिमों के साथ अज़ाब में होंगे , अब चाहे वो अरबी हों या अजमी .इजराइल के क़याम के मामले में यूरोप ने अपनी नैतिक कमजोरी और बड़े अपराध को छिपाने के लिए एक नए अपराध को जन्म दिया. अमेरिका और बाकी दुनिया अब उसमें शरीक है.

क़याम ए इजराइल और तड़पती इंसानियत

इस्राइल 14 मई को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है और इसके एक दिन बाद 15 को फिलिस्तीनी नकबा यानी अपनी तबाही को याद करते हैं क्योंकि इस्राइल की आज़ादी फिलिस्तीनीयो की तबाही थी जो उनपर मुसीबत की बिजली की तरह ही टूट पड़ी थी. मई 2021 में फिर इसराइल अपना आज़ादी का दिन और फलस्तीनी तबाही के दिन को याद करेंगे , ऐसे में हम किसके साथ होंगे यह सवाल है … आपके सामने …हमारे सभी नाज़रीन और पाठकों के सामने …..आप ज़ालिम के साथ हैं या मज़लूम के साथ आपको तै करना होगा

To be Continued …….

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