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हिन्दू राष्ट्रवाद और दलित-मुस्लिम विद्रोह

हिन्दू राष्ट्रवाद और दलित-मुस्लिम विद्रोह

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दलित और  मुसलमानों के खिलाफ देश भर में होने  वाले लगातार अत्याचारों के खिलाफ आंदोलनों का सिलसिला शुरू  होगया है हालाँकि दलित मुस्लिम एकता को लेकर पहले भी समाजी और सियासी कोशिशें होती रही हैं मगर नतीजा लगभग ज़ीरो रहा । देश में दलित और मुसलमानों के एक बड़े वर्ग का कारोबार एक जैसा है जैसे जूता बनाना,मरे जानवरों की खाल खींचना,खाल की सफाई करना,चमड़े की फैक्टिरीयां लगाना या उनमें काम करना ,चमड़ा पोलिश करना इत्यादि,।

 

हालांकि चमड़े से बनी वस्तुओं का एक्सपोर्ट और देश भर में इसकी ट्रेडिंग और फुटकर बिक्री का काम दूसरी क़ौमों ने अपने हाथ में रखा है ,यानी मेहनत तक का काम दलित और मुसलमान के पास है मुनाफे का ठेका देश के मुनाफाखोर के पास आगया।नतीजा यह रहा की दलित- मुसलमान जो पहले से मज़दूर था वो मज़दूर रहा कुछ को छोड़कर ,और जो कारोबारी जातियां थीं वो अमीर से अमीर होती चली गईं ।यह तो इन दोनों क़ौमों का वयवसायिक आंकलन रहा ।सामाजिक और राजनितिक स्तिथि इससे भी खतरनाक रही ।जिन गावों और क़स्बों में बढ़ाई,लोहार ,बुनकर,माली ,कुम्हार ,तेली,कुर्मी,माली,और दीगर अनुसूचित तथा जन जातियां आर्थिक तौर पर कमज़ोर थीं या अनपढ़ थीं उनपर आज भी ज़ुल्म और अत्याचार आम बात हैं ,किन्तु जिन इलाक़ों में ये क़ौमें पढ़ लिख गईं और मेट्रो शहरों को निकल गईं वो सामाजिक तौर पर सक्षम होगीं ,इंतज़ार नईम अपनी किताब “दलित समस्या जड़में कौन” में भारत वर्ष में होने वाले दलितों  पर अत्याचार का तफ्सील से ज़िक्र करते हैं ।उसको पढ़ा जाना आजके माहौल में ज़रूरी होगा .

DALIT ZULM

दलित मुसलमानो की इस कमज़ोरी का दोनों ही क़ौमों के रहनुमाओं ने लंबे समय तक सियासी फायदा उठाया और उनका शोषण किया जो आजतक जारी है ,सभी राजनितिक पार्टियों ने माइनॉरिटी और दलित विंग बनाये उनपर उनकी ही क़ौम के डायनासोर रुपी नेता बिठाये जो उनका राजनैतिक शोषण करके पार्टियों की झोली में लाकर डालते रहे हालाँकि अगर ये नेता सिर्फ अपनी क़ौमों के हितों को लेकर चलते तो पार्टी मुखिया न तो कोई चूं -चरा करते साथ  ही दलित और मुसलमान के विकास का ग्राफ SIGNIFICANTLY ऊपर आता ,मगर ना तो डायनासोर रुपी नेता ने सोचा और न ही ये क़ौमों की अवाम ही  बेदार हुई।

नतीजा आज हमारे  सामने है. देश की सत्ता धारी पार्टियों ने भी इन दोनों को एक दुसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया।

ऐसे ही विडंबनात्मक तूफानों से गुज़रती हुई ये दोनों कोमो की अवाम अब ज्वालामुखी का रूप धारण कर एक फैसलाकुन आंदोलन की ओर बढ़ चली है ,जिस के कुछ उदाहरण  गुजरात ,महाराष्ट्र तथा आंध्र प्रदेश व कर्नाटक  इत्यादि में देखने को मिले।

 

साथ ही गुजरात में पाटीदार समाज और हरियाणा में जाट समुदाय का आरक्षण को लेकर विशाल प्रदर्शन ने भी संघ व बीजेपी को अपने राजनितिक समीकरण पर मंथन करने के लिए मजबूर किया ,जो बीजेपी भारत  को कांग्रेस मुक्त बनाने की बात कर रही थी आज अपने को राजनितिक विरोध से मुक्ति दिलाने में मसरूफ हो गयी है। आज ये बात समझ आती है की लोकतंत्र में पूर्ण बहुमत का मिल जाना काफी नहीं होता बल्कि संसद में विधेयक को पास करने के लिए अन्य  विपक्षी दलों के भी सहयोग की ज़रुरत रहती है।GST बिल का पास होना कांग्रेस के बिना मुमकिन नहीं था ,हालाँकि UPA के दौर में BJP ने इस बिल का विरोध किया था .

 

देश में बढ़ते धार्मिक तथा जातिवाद की मार खिलाडियों को भी झेलनी पढ़ रही हे ,हाल ही में रियो ओलंपिक्स में सिल्वर मैडल जीतने वाली बैडमिंटन खिलाडी पी वी सिंधु के संबंध में जातिवाद की  नफरत का ज़हर फैलता हुआ उस वक़्त नज़र आया जब गूगल पर उनकी जाती तलाश करने वाले लोगों की संख्या नो लाख से बढ़कर उनके सेमिफाइनल तक पहुँचते पहुँचते  दस गुना हो गयी थी इसी नफरत के चलते  क्रिकेट प्लेयर विनोद कामली भी जातिवाद का शिकार हुए हालाँकि उनका प्रदर्शन सचिन तेंदुलकर से बेहतर था ।ऐसे ही एक और दलित युवा खिलाडी प्रणव धनावड़े ने जूनियर  क्रिकेट में एक पारी में( एक हज़ार नौ) 1009 रन बनाने का रिकॉर्ड क़ायम करने के बावजूद अंडर 16 क्रिकेट टीम में जगह न मिलना किसी साज़िश का नतीजा थी ,या उसका दलित होना उसके लिए एक श्राप था इस वेवस्था के लिए किसको ज़िम्मेदार ठहराया जाए आप ही बताओ   सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन का प्रदर्शन अच्छा न होने  के बावजूद टीम में पहले से शामिल कर लेने का समाचार आम है ।

 

उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में राजनितिक मात खाने के बाद BJP बैकफुट पर नज़र आनी चाहिए थी लेकिन हाथ में सत्ता के ३ साल रहने की ऐंठ ने पार्टी के नेताओं को मुखर बने रहने के लिए मजबूर किया हुए है.देश में बढ़ रहे कामयाब जनांदोलन लोकतंत्र की वास्तविकताओं का एहसास करा रही है ,मगर एक बड़ा सवाल बाक़ी है की चौतरफा आंदोलनों के चलते NDA संघ की छत्र छाया में हिन्दू राष्ट्र के पाले सपने को साहकार कर पायेगी जबकि बीजेपी की पॉपुलैरिटी में काफी तेज़ी से गिरावट आरही है जबकि सोशल मीडिया पर अपना वर्चस्व बनाये रखने में वो अभी भी कामयाब है जो देश की जनता के मिज़ाज को आसानी से बदल पाने की ताक़त नहीं रखता  ।

 

देश में तेज़ी से बढ़ रहे हिन्दू राष्ट्रवादी वयवस्था के खिलाफ दलित-मुस्लिम  विद्रोह किसी बड़े राजनितिक परिवर्तन की ओर सफलता की कितनी सीढ़ियां चढ़ पायेगा या फिर किसी चाणकय नीति का होजायेगा शिकार यह अभी देखना बाक़ी है मगर फिलहाल UP असेंबली चुनाव में सेक्युलर वोटों के बिखरते शीराज़े को रोकने की कोई सफल कोशिश नहीं है जो BJP के लिए एक अच्छा शगुन है ।

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