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पानी संकट और पुलवामा अटेक , आपको पता है ?

पानी संकट और पुलवामा अटेक , आपको पता है ?

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पानी संकट और पुलवामा अटेक , आपको पता है ?

आपके पास राशन कार्ड है ? अगर नहीं तो बनवा लें अब पानी उसी से मिलेगा ,और वो भी एक परिवार को 200 लीटर बस

मुझे नहीं पता की 3rd वर्ल्ड वार पानी पर होगी या विचार धारा पर , लेकिन भारत में ज़रूर रोज़ाना पानी पर होती जंग के समाचार मिलते रहते हैं । राजस्थान के 33 में से 19 जिलों में पानी का संकट है , संकट की दलदल में फस्ती देश की जनता कई कारणों से इसके लिए खुद ज़िम्मेदार है ।

पानी की इस बिकट समस्या से अपना पल्ला झाड़ने के लिए भी सियासी कबड्डी ही चलती रहेगी या सारे मुद्दों पर सील लगाकर पहले देश के हर नागरिक को मूल भूत सुविद्याएँ देने का काम सरकारों को करना होगा , अब ये आप तय करे आपको पानी , बिजली , स्वास्थ्य , शिक्षा ,रोटी ,कपडा , घर चाहिए या मंदिर , मस्जिद , गुरु द्वारा , चर्च , मज़ार ,गाय , गोबर , गो मूत्र , धार्मिक आस्था ? जीवन होगा तो आस्था होगी न ? अब बीमार और भूका आदमी का क्या आस्था और क्या इबादत ।

अब महाराष्ट्र के बुलढाणा ज़िले के चिंचोली गांव में राशन कार्ड के आधार पर हर परिवार को 200 लीटर पानी देना शुरू कर दिया है।
इसकी एक वजह यह भी है की यहां टैंकर से पानी हासिल करने के लिए लड़ाई झगड़े हुआ करते थे जिनमें आम लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते थे।

आपको बता दें बुलढाणा ज़िले में स्थित लगभग सभी बांध पानी की कमी से जूझ रहे हैं। सभी बड़े, मंझले और छोटे बांधों में से सत्तर फीसदी पानी ख़त्म हो चुका है।

चिंचोली गांव में सुबह पांच बजे का नज़ारा बेहद दुखद होता है , जैसे ही पानी का टैंकर वहां पहुँचता है यहां रहने वालीं अधिकतर महिलायें अपने सिर पर कई घड़े और कई बाल्टियां लेकर अपने राशन कार्ड को संभाले लाइन में लग जाती हैं।

आप सोचें उसका क्या हाल होता होगा जो सुबह 5 बजे से लाइन में लगी हो और अंत में पता चले की पानी खत्म होगया है और वो खाली बर्तन लेकर अपने घर को लौटती है ।

ख़ैर आइये पहले हम आपको PM मोदी के लोकसभा क्षेत्र लीये चलते हैं ।आपको बता दें हर साल गर्मी में बनारस पानी के लिए संघर्ष करता नजर आता है। पानी का इंतजाम करने से लेकर पानी के लिए प्रदर्शन तक के नज़ारे दिखते हैं।2014 में पीएम मोदी जब बनारस के सांसद बने तो वहां की जनता की उम्मीद जगी कि हालात बदलेंगे।ट्रांस वरुणा में पीएम मोदी की पहल से एक वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट बना भी लेकिन अभी तक इसकी टेस्टिंग ही चल रही है।होसकता है 2022 से पहले यह शुरू होजाये ।

मोदी जी के ही संसदीय क्षेत्र के बजरडीहा इलाक़ों में बरसों से पानी है ही नहीं उसके बावजूद चुनाव में मुद्दा पानी नहीं पुलवामा और एयर स्ट्राइक छाया रहा अब जनता को पानी बाई एयर आएगा या पाकिस्तानियों का सर काट कर उससे पानी निकाला जायेगा यह तो चुनाव प्रचारक ही बताएँगे ।

हम तो यह बता सकते हैं कि बनारस की जनता इस वक़्त पानी के संकट से जूझ रही रही , जबकि पूरे देश में स्तिथि भयावय बनी हुई है और यह संकट गहराया चला जा रहा है , लेकिन फिर भी देश वासियों को पैनिक होने की ज़रुरत नहीं शायद क़ुदरत कोई हल निकाल देगी । लेकिन उसके लिये सरकारों को ईमानदार होना ज़रूरी है , और जनता को भी वफादार रहना चाहिए । अब ये ईमानदारी और वफादारी क्या है यह समझना होगा ,लेकिन यहाँ यह मुद्दा नहीं है , इसपर चर्चा बाद में होगी ।

800 करोड़ का पानी का कारोबार किसका लाभ किसको हानि

भारत व बांग्लादेश में सेंकड़ो लोग, आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायनों से प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं, वहीं बोतलबंद पानी का 800 करोड़ रुपयों का बाज़ार फलफूल रहा है।रोज़गार वितरण का लालच देकर अरबों रुपया कमाने वाली पानी बेचने वाली कम्पनियाँ जल प्रबंधन और वातावरण संरक्षण में अपनी रूचि दिखाएँ तो भी रोज़गार के अवसर मिल जायेंगे और पैसा भी आजायेगा किन्तु ऐसा नहीं करतीं ।

RO Water से क्या नुकसान होता है

बोतलबंद पानी बेचने वाली कम्पनियाँ Pure Water के नाम पर Poor Water बेच रही हैं जिससे लोगों में विभिन्न नई बीमारियां पैदा हो रही हैं ।मिनरल वाटर कई मुल्कों में गुर्दे और लीवर के मरीज़ों के लिये हॉस्पिटल में दिया जाता है,जबकि स्वस्थ्य इंसान के लिये नेचुरल वाटर यानि प्राकृतिक जल की ज़रूरत होती है ,और जो लोग Reverse Osmosis (RO) का पानी पीते हैं उनको कुछ समय बाद कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं , जैसे जोड़ों का दर्द , इंफैक्शन, पाचन क्रिया की गड़बडी, कमजोरी,सिरदर्द,पेट खराब रहना इत्यादि ।

पानी में प्राकृतिक रूप से कुछ महत्वपूर्ण तत्व मौजूद होते हैं। इनको दो भागो में रखा जाता है, एक गुड मिनरल्स और दूसरे बैड मिनरल्स। पहले श्रेणी वाले मिनरल्स में केल्शियम, मैग्नीशियम,पोटाशियम जैसे तत्व शामिल होते हैं। जो हैल्दी रहने के लिए बहुत जरूरी है। इसके दूसरी तरफ बैड मिनरल्स में लेड,आर्सेनिक,बेरियम, एल्‍यूमीनियम आदि शामिल होते हैं।

जल , मानव का जन्म सिद्ध अधिकार

जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है, इसे मानवाधिकार का दर्जा भी दिया जाता है। इसके बावजूद दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता। कहा जाता है कि सन् 2025 तक विश्व की 50 फीसदी आबादी भयंकर जल संकट झेलने को मजबूर होगी।

स्वच्छ जल की आपूर्ति तकरीबन 7400 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष यानि लगभग 4500 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन होती है। इससे आपको ऐसा लगता होगा कि यह तो ज़रूरत से भी ज्यादा है, पर लगातार बढ़ती मांग और घटती सप्लाई से वैश्विक जल प्रबंधन में कई परेशानियाँ हैं। ताज़े पानी के संसाधन विश्व में असमान रूप से फैले हुए हैं। उदाहरणतः एशिया में, जहाँ संसार की 60 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, विश्व के केवल 36 प्रतिशत जल संसाधन हैं। इस असमानता से जल प्रबन्धन पर बुरा असर पड़ता है: जैसे प्रति व्यक्ति जल की मात्रा घट जाती है, जिसका अर्थ है पानी की तंगी और कुछ इलाकों में संकट की स्थिति पैदा होजाती है और भूमिगत जल के दुरुपयोग से भविष्य में पीने योग्य पानी तक इंसान की पहुंच को और हानि पहुंचती है।

संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक, मानवीय और कृषि-सम्बन्धित जूठन के रूप में 20 लाख टन गन्दगी और विषाक्त जल हमारे पानी में मिल जाता है। इस गन्दगी और विषाक्त पदार्थों से ताज़े जल की उपलब्धि 58 प्रतिशत तक घटने का डर है। इस के अतिरिक्त प्रदूषण से होने वाले नाटकीय जलवायु परिवर्तन से भी जल की उपलब्धि 20 प्रतिशत घटने की आशंका है। पानी के बढ़ते उपभोग और बढ़ते शहरीकरण के कारण पानी का संकट और भीषण होता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण के परिणामस्वरूप भूमिगत जल का भी संसार के अनेक शहरों में ज़रूरत से ज़्यादा दोहन हो रहा है

पानी से जुड़े मुद्दों पर एक नज़र

हमारे देश में जल के दो मुख्य स्रोत हैं – वर्षा और हिमालय के ग्लेशियरों का हिम-पिघलाव। आपको हम बता दें कि भारत में सालाना वर्षा 1170 मिलीमीटर होती है, जिससे हम संसार के सब से अधिक वर्षा वाले देशों में आते है। परन्तु, यहाँ एक ऋतु से दूसरी ऋतु में, और एक जगह से दूसरी जगह पर, होने वाली वर्षा में बहुत अधिक अन्तर हो जाता है।

जहाँ एक सिरे पर उत्तरपूर्व में चेरापूँजी है, जहाँ हर साल 11000 मिलीमीटर बौछार होती है, वहीं दूसरे सिरे पर पश्चिम में जैसलमेर जैसी जगहें हैं जहाँ मुश्किल से 200 मिलीमीटर सालाना बारिश होती है। राजस्थान के लोगों को यह यकीन करना मुश्किल लगता होगा कि गुजरात में पिछले वर्ष बाढ़ आने की वजह से 2000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ या फिर हिमाचल की सतलज नदी की बाँध से हज़ारों लोग बेघर हो गये या यह कि हाल की बहुवर्षा से मुंबई का जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया था ।

हालांकि बर्फ व ग्लेशियर ताजे पानी के इतने अच्छे उत्पादक नहीं हैं, पर वे इसे बांटने के अच्छे साधन हैं व जरुरत के समय पानी देते हैं, जैसे कि गर्मी में। भारत में 80 प्रतिशत नदियों का प्रवाह गर्मियों के जून से लेकर सितम्बर तक के चार महीनों मे होता है जबकि गर्मी व उमस से भरी समुद्री हवा उत्तर पूर्व से अंदर की ओर आती है (दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम)।

पानी की कमी भारत में बड़ी तेजी से भयानक रूप लेती जा रही है। विश्व बैंक की एक रपट के अनुसार, जब भारत की जनसंख्या 2025 में बढ़कर 140 करोड़ हो जाएगी, पानी की बढ़ी हुई जरुरत को पूरा करने के लिए देश की सभी जल स्त्रोतों का उपयोग करना पड़ेगा।

नाकारा सरकारी नीतियों ने जल स्त्रोतों के अत्याधिक प्रयोग तथा प्रदूषण को बढ़ावा दिया है। पुनर्भरण से दुगनी दर पर ज़मीनी पानी बाहर निकाला जा रहा है जिससे कि जलस्तर हर साल 1 से 3 मीटर नीचे गिर जाता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की बीस बड़ी नदियों में से पाँच का नदी बेसिन पानी की कमी के मानक 1000 घन मीटर प्रति वर्ष की दर से कम होरहा है और अगले तीन दशकों में इस में पाँच और नदी बेसिन भी जूड़ेंगे।

शहर क्यों ज़मीन में धंस रहा है

आपको बता दें 15वीं शताब्दी में मेक्सिको शहर की स्थापना विजेता स्पेनी सेना द्वारा हुई । यह जगह पहले झीलों की नगरी हुआ करती थी विजेताओं द्वारा शहर का निर्माण करने के लिये तमाम झीलों को बरबाद कर दिया गया । विडंबना ही है कि शहर के बढ़ते आकार व ओद्योगिकीकरण से अभी भी भूजल का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है। शुद्ध पेयजल की कमी के साथ साथ अपर्याप्त सीवेज और रिसते पाईपों की बदौलत मेक्सिको शहर हर माह 4 सेंटीमीटर धंसता चला जा रहा है।

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