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पहले यह तो कर लो , फिर कहीं …

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*आप भला तो जग भला*

अब्दुल रशीद अगवान

ओखला में ऐसे सोशल वर्कर और एक्टीविस्ट की कमी नहीं है जो पूरे मुल्क में होने वाले हादसों पर रद्दे अमल दिखाते हैं। सोशल मीडिया से लेकर जंतर मंतर तक वे सरगरम रहते हैं।

यहां पर सोशल मीडिया पर घंटों मालूमात तक़सीम करते लोगों की कमी नहीं है। इसमें शक नहीं है कि समाज को ऐसे लोगों की ज़रूरत है। मगर ऐसे लोगों की भी ज़रूरत है जो ओखला को और बेहतर और सरगरम और ताक़तवर बना सकें। क्योंकि ओखला रहेगा तो हम सब रहेंगे।

ओखला क्यों नहीं रहेगा? यह एक अहम सवाल है।

 

किसी भी जगह आबाद होने के लिये जिन चीज़ों को देखा जाता है उनमें पानी, साफ हवा, तालीमी माहौल, अमन, समाजी संजीदगी, आने-जाने के साधन और आमदनी के मौक़े अहम हैं। शुरू में इनमें से कई चीजें ओखला में पाई जाती थीं इसलिए यहां बड़ी तेज़ी से आबादी बढ़ी। मगर अब एक एक करके ये नेअमतें रुख़सत हो रही हैं।

ताज़ा हवा और साफ पानी की कमी एक अरसे से महसूस हो रही है और यह कमी तेज़ी से बढ़ रही है। वो दिन दूर नहीं जब लोग ताज़ा हवा और साफ पानी की तलाश में ओखला छोड़ने लगेंगे। बल्कि बहुत से लोग ऐसा कर भी चुके हैं।

ताज़ा हवा और साफ पानी के लिए जिस चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है वो हैं पेड़ पौधे। मकानों की बनावट, तंग सड़कें, अवामी फायदे की ज़मीन पर नाजायज़ क़ब्ज़े और एनजीओ और सरकार की बेतवज्जह की वजह से न पेड़-पौधे लगाने का रिवाज आम है और न ताज़ा हवा और साफ पानी की फिक्र।

पूरी दुनिया में मुसलमानों पर कहीं ज़ुल्म हो, ओखला सड़कों पर निकल आता है मगर यहां पर ख़ुद पर जारी अपना और परायों का ज़ुल्म हमें शायद नज़र नहीं आता है।

जुलाई का महीना एक ऐसा मौक़ा देता है जिसमें कि हम ओखला में ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ पौधे लगा सकें ताकि यहां आसमान से बरसती आग की तपिश कम हो, साफ हवा में सांस लेना मुमकिन और पीने का पानी हमें और आने वाली नस्लों को मिल सके।

क्या हम अपने घर, आसपास या इलाक़े में कहीं एक हरा बूटा लगा कर अपनी बेदारी और ज़िन्दगी का सुबूत दे सकते हैं?

याद रखें जो लोग अपने बारे में संजीदा नहीं है उनका औरों के लिए दिन भर तड़पना एक निफाक़ के सिवा कुछ नहीं है।

अब्दुल रशीद अगवान

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