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दुनिया में भुकमरी झेल रहे देशों में भारत का स्थान भी जान लो

दुनिया में भुकमरी झेल रहे देशों में भारत का स्थान भी जान लो

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दुनिया में भुकमरी झेल रहे देशों में भारत का स्थान भी जान लो
दूसरा भाग 2

By Ali Aadil Khan (Editor-in-chief)

 

दोस्तों क्या यह तस्वीर याद है आपको? इसे नाम दिया गया था “The vulture and the little girl ” ।दरअसल यह एक स्टोरी है एक अफ़्रीकी देश में भुकमरी की, इस तस्वीर में एक गिद्ध भूख से मरने वाली एक छोटी बच्ची के इंतज़ार में है ।

आगे कि स्टोरी इंसानियत का दर्द रखने वालों को हिला देने वाली है , इस तस्वीर को एक साउथ अफ्रीकन फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर ने 1993 में सूडान के अकाल के समय खींचा था और इसके लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था ।

लेकिन कार्टर इस सम्मान का आनंद कुछ ही दिन उठा पाए क्योंकि कुछ महीनों बाद 33 वर्ष की आयु में उन्होंने आत्महत्या कर ली । क्यों की आत्महत्या , क्या है इसका वाक़िया ?

दरअसल जब कार्टर इस सम्मान का जश्न मना रहे थे तो सारी दुनिया में प्रमुख टीवी चैनल और समाचार नेटवर्क पर इसकी चर्चा हो रही थी । उनका पश्चाताप तब शुरू हुआ जब एक ‘फोन इंटरव्यू’ के दौरान किसी ने पूछा कि उस लड़की का क्या हुआ? कार्टर ने कहा कि वह देखने के लिए रुके नहीं क्यों कि उन्हें फ्लाइट पकड़नी थी ।

 

इस पर उस व्यक्ति ने कहा ” मैं आपको बता रहा हूँ कि उस दिन वहां दो गिद्ध थे जिसमें से एक बच्ची के मरने के इंतज़ार में था और दुसरे के हाथ में कैमरा था।” और वो तुम थे ।

इस कथन के भाव ने कार्टर को अंदर तक झकझोर दिया कि वे गहरे दुःख और सदमे में चले गए और आत्महत्या कर ली ।Actually कार्टर में मानवता थी इसलिए अंतिम क़दम उठाया ,हालाँकि आत्महत्या खुद एक गुनाह है और कायरता का निशान है , मगर वो depression में जो चले गए थे ।

किसी भी स्थिति में कुछ हासिल करने से पहले मानवता का आना बेहद ज़रूरी है ।शायद आज वो बच्ची भी ज़िंदा होती और कार्टर भी अगर वे उस बच्ची को उठा कर यूनाईटेड नेशन्स के फीडिंग सेंटर तक पहुँचा देते जहाँ वो बच्ची घिसटकर पहुँचने की कोशिश कर रही थी ।

अब आप बताएं आज कौन है कार्टर और कौन है गिद्ध ?मैं सरकार और सरकारी मीडिया की बात नहीं कर रहा हूँ , फैसला आपके हाथ है ।

यह सही है कि एशिया का एक बड़ा भूभाग गरीब और विकासशील देशों से बना है। ऐसे देश जिन्हें गुलामी से मुक्ति पाए ज्यादा समय नहीं बीता है। फिर भी इसी भूभाग में ऐसे देश भी हैं जो आर्थिक मोर्चे पर बड़ी ताकतों के समकक्ष माने जाने लगे हैं, जिनकी आर्थिक क्षमता के आगे बड़े बाजार नतमस्तक हैं। इन देशों में चीन, कोरिया, जापान और भारत शामिल हैं। बल्कि इनमें से चीन तो घोषित महाशक्ति है।

 

अन्य चार देश सामरिक तौर पर विश्व के अग्रणी देशों में आ गये हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवे के विपरीत, एशिया में भुखमरी की दर का विस्तार बताता है कि इस महाद्वीप की सरकारों की प्राथमिकताएं क्या हैं।

काश एशिया के विकसित देश अपने दुसरे पडोसी ग़रीब देशों कि मदद करते तो शायद इंसानियत का जो नुकसान कुपोषण और भूक कि वजह से हुआ है वो न होता , और इसके लिए ज़रूरत यूनिटी कि थी जिसके लिए बड़े स्तर पर कोई काम हुआ नहीं अलबत्ता एसोसिएशन फॉर एशियाई यूनियन AAU (NGO) इस सम्बन्ध में कुछ कोशिशें करती रहती है जिसको सरकारी कोई सहयोग नहीं है ।

क्या आप जानते हैं ,दुनिया के कुपोषितों में से 19 करोड़ कुपोषित लोग भारत में हैं। भारतीय आबादी के सापेक्ष भूख की मौजूदगी करीब साढ़े 14 फीसदी की है। भारत में पांच साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे सही पोषण के अभाव में जीने को विवश है जिसका असर मानसिक और शारीरिक विकास, पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक क्षमता पर पड़ता है।

रिपोर्ट की भाषा में ऐसे बच्चों को ‘स्टन्टेड’ कहा गया है। पड़ोसी देश, श्रीलंका और चीन का रिकॉर्ड इस मामले में भारत से बेहतर हैं जहां क्रमशः करीब 15 प्रतिशत और 9 प्रतिशत बच्चे कुपोषण और अवरुद्ध विकास के पीड़ित हैं। भारतीय महिलाओं के हाल भी कोई अच्छे नहीं। रिपोर्ट बताती है कि युवा उम्र की 51 फीसदी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं यानी उनमें खून की कमी है।

भारत में कुपोषण से निपटने के लिए योजनाएं बनी हैं लेकिन उन पर शिद्दत से अमल होता नहीं दिखता। महंगाई और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल ने गरीबों और निम्न आय के लोगों को असहाय बना दिया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली डैम तोड़ रही है रही है और मिड-डे मील जैसी आकर्षक परियोजनाएं भ्रष्टाचार में डूबी हैं।

दूसरो तरफ भारत का किसान कर्ज और खराब मौसम की दोहरी मार झेल रहा है। बीज और खाद की उपलब्धता का रास्ता निजी कंपनियों से होकर जा रहा है, ज़मीन में पानी सूख रहा है, खेत सिकुड़ रहे हैं, निवेश के जोन पनप रहे हैं, बिजली के बिल ,तेल और ईंधन की कीमतें उछाल पर हैं और लोग जैसे-तैसे बसर कर रहे हैं। इस दुर्दशा में उस अशांति, हिंसा और भय को भी जोड़ लीजिए जो कभी धर्म-जाति के नाम पर कभी खाने-पीने या पहनने-ओढ़ने के नाम पर अपना तांडव करती रहती है।

हाल बहुत बुरा है आंकड़े एहि बता रहे हैं? वो दृश्य जो सरकारें दिखाती रही हैं फर्जी हैं वो आंकड़े नहीं बताये जाते जहां असली भारत बसता है । पहले इस चिंता को अपनी आगामी सक्रियता का आधार बनाना चाहिए कि हालत नहीं सुधरे तो सारी भव्यताएं, सारा ऐश्वर्य, सारी फूलमालाएं सूखते देर नहीं लगेगी और भूख और अन्य दुर्दशाएं हमें एक क़बाइली हिंसा में धकेल देंगी।जिसका नमूना पिछले दिनों चेन्नई और महाराष्ट्र में देखने को मिला ।

इन सभी समस्याओं का हल यह है की सरकारी योजनाएं दीर्घकालीन और सख्ती से लागू होनी चाहिए, सुनिश्चित क्रियान्वयन के लिए एक मुस्तैद पारदर्शी मशीनरी बनायी जाए, गैर-योजनागत मदों के खर्चों में कटौती हो, गरीबों से सब्सिडी न छीनी जाए, बैंकों को उन्हें राहत देने को कहा जाए, किसानों के लिए सस्ते और टिकाऊ संसाधन विकसित किए जाएं ।

बिना सोचे समझे शहरीकरण और निर्माण को बंद किया जाए, स्कूली बच्चों की शिक्षा में देहात, किसानी, गरीबी और पोषण से जुड़े विषय अनिवार्य किए जाएं, विशेषज्ञ दौरा करें, वंचित तबकों के बच्चों को पोषणयुक्त आहार के लिए केंद्र खोले जाएं, बीमार हों तो उन्हें सही समय पर सही इलाज मिल सके.

इसके लिए पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य केंद्र खोले जाएँ , लोगों में सामूहिकता और भागीदारी की भावना का विकास करने के लिए अभियान चलाए जाएं, खाते-पीते घरों के स्कूली बच्चों को फूड वेस्टेज के नुकसान के बारे में शिक्षित और जागरूक किया जाए।

सरकारी स्तर पर अभियान चलाया जाए की महंगी दावतों और मध्यवर्गीय विलासिताओं पर अंकुश लगाया जाए,बल्कि शादी में लड़की वालों के यहाँ दावत पर पाबंदी लगाडी जाए और उस पर खर्च होने वाली आवंटित रक़म को इलाक़े के ग़रीब परिवारों में तक़सीम करा दिया जाए ,जिससे वो अपनी बेटियों की शादी का बुनयादी खर्च पूरा कर सकें ।

विज्ञापन कंपनियों को भी दिशा निर्देश दिए जाएं, होटलों और शैक्षिक संस्थानों, दफ्तरों, कैंटीनों, बैठकों, शादी और अन्य समारोहों और अन्य संस्थाओं में खाना बेकार न किया जाए। इस खाने के वितरण की हर राज्य में जिला स्तर पर और भी यथासंभव निचले स्तरों पर मॉनीटरिंग की व्यवस्था हो।

इस तरह ऐसे बहुत से तरीके होंगे जो हम अपने समाज की बदहाली और कुपोषण से छुटकारे के लिए कर सकते हैं। आखिर में खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम अशांत, अस्थिर, हिंसक और अस्वस्थ समाज चाहते हैं ?

आज देश और दुनिया में ज़रुरत इस बात की है कि वातावरण और जल संसाधन पर जनता को जागरूक किया जाए साथ ही प्रदूषण पैदा करने वाले कारखानों से निकलने वाली ज़हरीली गैसों और पदार्थों का उचित प्रबंध किया जाए , WASTE MANAGEMENT कंपनियों को प्रोत्साहन दिया जाए .

वृक्षारोपण और जल संसाधन से सम्बंधित पद्धति को स्कूल LEVEL पर सेक्स एजुकेशन की जगह अनिवार्य किया जाए ।मंदिर मस्जिद की जगह , गाये , गोबर और पेशाब की जगह सोहाद्र ,शिक्षा , स्वास्थ्य , सामाजिक सुरक्षा और वातावरण पर टीवी डिबेट्स की जाएँ तभी कुछ देश और दुनिया का भला होसकता है वरना देश को सूखा ,कुपोषण , भुकमरी , प्रकिर्तिक आपदाओं और नफरत के नासूर से कोई नहीं बचा सकता ।

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