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जालियांवाला बाग़ क़त्लेआम की साझा विरासत का सच जो कोई नहीं बताता

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शम्सुल इस्लाम

जालियांवाला बाग़ क़त्लेआम की साझी शहादत साझी विरासत की वो गौरव गाथा जो सरकार नहीं बताएगी

 

जालियांवाला बाग़ क़त्लेआम की 100साला बरसी साझी शहादत साझी विरासत की गौरव गाथा जो सरकारी बस्तों में बंद पड़ी है!

विश्व इतिहास की पहली साम्राज्यवादी शक्ति (The first imperialist power of world history) अंग्रेज नहीं थे। इतिहास साम्राज्यों की दास्तानों से भरा पड़ा है। हम सब पुर्तगाली, रोमन, फ्रांसीसी, उस्मानियाई, जर्मन इत्यादि साम्राज्यों की रक्त रंजित दास्तानों से बखूबी परिचित हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि अंग्रेज साम्राज्य एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह साम्राज्य ज्यादा व्यापक स्थायी और निरंतरता लिये था। अंग्रेज़ी साम्राज्य (English empire) के ज्यादा टिकाऊ होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने साम्राज्य चलाने के काम को एक संस्थागत रूप दिया था। उन्होंने इस काम के लिए दफ्तरों का जाल-सा बिछा दिया था। साम्राज्य द्वारा की जाने वाली हर गतिविधि की सूचना हासिल की जाती थी और उसे संग्रहित किया जाता था। अंग्रेज साम्राज्य पहला साम्राज्य था, जिसने राज-काज से संबंधित तमाम दस्तावेजों और कागजात को अभिलेखागारों में सुरक्षित रखना शुरू किया। ये सब करने के पीछे उनका पुरानी चीजों के प्रति मोह नहीं था, बल्कि वे इतिहास के इन अनुभवों के माध्यम से वर्तमान को समझना और भविष्य को संचालित करना चाहते थे।

ऐतिहासिक दस्तावेजों का यह ख़ज़ाना, जो आज़ादी के बाद राष्ट्रीय अभिलेखागार कहलाया, ऊपरी तौर पर तो गुजरे जमाने से संबंधित बेज़ुबान दस्तावेजों का रिकार्ड ही लगता है। लेकिन जब 1994 में  जलियांवाला बाग़  अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को अँगरेज़ शासकों द्वारा अंजाम दिए गए क़त्लेआम की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस विभाग ने मूल दस्तावेजों, व्यक्तिगत कागज-पत्रों, प्रतिबंधित साहित्य और चैंका देने वाले चित्रों की प्रदर्शनी लगाई (जिस को पहली बार 13 अप्रैल, 1994 को जालियांवाला बाग़  में प्रदर्शित किया गया) तो एक तरफ़ गोरे शासकों के बेमिसाल बर्बर दमन और ख़ूंरेज़ी की दास्तानें जानकर दिल दहल उठा तो दूसरी ओर  देश के हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों और अन्य धर्मों के अनुयायों ने किस बहादुरी से इस दमन-बर्बरता का सामना किया और मिलकर बेमिसाल क़ुर्बानियां दीं तो इसे जानकर सीना फ़ख़्र से फूल गया।

इस प्रदर्शनी को देश के विभिन्न बड़े शहरों में घुमाया गया तो बेज़ुबान दस्तावेजों में छिपा अँगरेज़ शासकों की बर्बरता और जनता के प्रीतिरोध का इतिहास सजीव हो उठा, मानो दफ़न इतिहास ज़िंदा होकर सामने खड़ा हो।

 

यह प्रदर्शनी अगर एक तरफ अंग्रेज़ी  शासन की बर्बरता, वहशीपन और चालाकी की शर्मनाक दास्तान बयान करती थी तो दूसरी ओर भारत की आजादी के मतवालों की बहादुरी की गाथाओं का भी जीवंत चित्रण करती थी ।

इस प्रदर्शनी में प्रस्तुत सामग्री चौंका देनेवाली थी और इस बात का शिद्दत से एहसास कराती थी कि जब अंग्रेजों का राज शिखर पर था, तब भी इस देश के लोग अंग्रेज़ी लुटेरों से बराबर का लोहा ले रहे थे। यह कितना दुखद है कि इस अभूतपूर्ण पारदर्शिनी को बस्तों में बंद कर दिया गया और बर्बर दमन और विरोध की शानदार दस्तानों पर ताला डल गया जो जालियांवाला बाग़ क़त्लेआम की 100वीं बरसी पर भी नहीं खुला है।

क़त्लेआम के चश्मदीद दस्तावेज़ Eyewitnesses of slaughter

सबसे दिल दहला देने वाले दस्तावेज और चित्र ‘जालियांवाला बाग़’त्रासदी से संबंधित हैं। जालियांवाला बाग़ के कत्लेआम से पहले के और बाद के मूल चित्र (जो पुलिस रिकार्ड में थे) को दर्शाया गया । रतन देवी जिन्होंने 13 और 14 अप्रैल 1919 की रात जालियांवाला बाग़ में हजारों लाशों और ज़ख़्मियों के बीच अपने पति की लाश के सिरहाने बैठकर बिताई थी, उनका रोंगटे खड़े कर देने वाला मूल बयान भी पढ़ने को मिलता है,

“मैं अपने मृतक पति के पास बैठ गई, मेरे हाथ बांस का एक डंडा भी लग गया था, जिससे मैं कुत्तों को भगाती रही। मेरे बराबर में ही तीन और लोग गंभीर रूप से जख्मी पड़े थे, एक भैंस गोलियां लगने के कारण बुरी तरह रेंग रही थी, और लगभग 12 साल का एक बच्चा, जो बुरी तरह से जख्मी था और मौत से लड़ रहा था, मुझसे बार-बार निवेदन करता था कि मैं उसे छोड़ कर न जाऊं। मैंने उसे बताया कि वो फिक्र न करें, क्योंकि मैं अपने मृतक पति की लाश को छोड़कर जा ही नहीं सकती थी। मैंने उससे पूछा कि अगर उसे सर्दी लग रही हो तो मैं उसे अपनी चादर उढ़ा देती हूं, लेकिन वह तो पानी मांगे जा रहा था, लेकिन पानी वहां कहां था।”

4 अक्टूबर, 1919 के ‘अभ्युदय’अखबार में छपी 18 वर्षीय अब्दुल करीम और 17 वर्षीय रामचंद्र नाम के दो दोस्तों की तस्वीरों और जालियांवाला बाग़ में उनकी शहादत के वृत्तांत को पढ़कर दिल-दिमाग सन्न हो जाता है। ये दोनों ही अमृतसर से नहीं बल्कि लाहौरियों के बेटे थे। अब्दुल करीम की शहादत के तुरंत बाद जब परीक्षाफल प्रकाशित हुआ तो पंजाब विश्वविद्यालय की दसवीं की परीक्षा में वह सर्वप्रथम आए।

निहत्थे देश वासियों पर हवाई बम्बारी

यह शर्मनाक तथ्य भी पहली बार सामने आया कि जालियांवाला बाग़ क़त्लेआम के अगले दिन, 14 अप्रैल, 1919 को अंग्रेज, वायुसेना के एक जहाज नंबर 4491, किस्म बी.ई.जेड.ई. जो कि 31वें स्क्वाड्रन का हिस्सा था, को उड़ाते हुए कैप्टन कारबेरी ने 2.20 मिनट से लेकर 4.45 मिनट तक जबर्दस्त बमबारी की थी। अंग्रेज़ी वायुसेना के रिकॉर्ड में दर्ज इस हवाई बम्बारी के ब्यौरे के अनुसार:

“समय 15.10, जगह गुजरांवाला रेलवे स्टेशन (अब पाकिस्तानी पंजाब में) के आसपास बमबारी से आग की लपटें उठ रही हैं। समय 15.20 स्थान गुजरांवाला के उत्तर पश्चिम में 2 मील दूर एक गांव-लगभग 150 लोगों की भीड़ पर बमबारी, गांव में मशीन गन से 50 राउंड गोली चलाई। समय 15.30, स्थान- पहली वाली जगह से एक मील दक्षिण की ओर पचास लोगों की भीड़ पर बमबारी, गांव में मशीन गन द्वारा 25 राउंड गोलीबारी, एक खेत में 200 लोगों की भीड़ पर बमबारी, लोग भागकर एक घर में घुसे, जिस पर 30 राउंड मशीन गन से गोलीबारी, समय 15.40, स्थान गुजरांवाला नगर शहर के दक्षिण में लोगों की भीड़ पर बमबारी, सड़कों पर चलते हुए ‘देसी’लोगों पर मशीन गन से 100 राउंड गोलीबारी। 15.50 पर जब बमवर्षक जहाज लाहौर के लिए चला तो कोई प्रणाली सड़कों पर नहीं था। समय, 16.45, लाहौर हवाई अड्डे पर बमवर्षक जहाज की सही सलामत वापसी।”

प्रतिरोध की हैरत-अंगेज़ दास्तानें

इस प्रदर्शनी में सर सिडनी आर्थर टेलर रौलेट (Sir Sydney Arthur Taylor Rowlett) की अध्यक्षता में सन् 1917 में गठित राजद्रोह समिति से संबंधित गुप्त दस्तावेजों को पहली बार पेश किया गया । इस समिति ने उस समय में 87020 रुपये खर्च करके कलकत्ता और लाहौर में अनेक गुप्त बैठकें कीं और 18 अप्रैल, 1918 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट को सरकार ने स्वीकार करके अराजकता या क्रांतिकारी अपराध अधिनियम (रौलेट एक्ट के नाम से बदनाम) के तौर पर 18 मार्च, 1919 को देश भर में लागू किया।

देश भर में इसका जबर्दस्त विरोध हुआ। प्रदर्शनी में मोहम्मद अली जिन्नाह का 28 मार्च, 1919 वाला वह पत्र भी प्रदर्शित किया गया, जिसमें उन्होंने सरकार पर ‘सभ्यता का दामन छोड़ देने’का इल्जाम लगाते हुए इम्पीरियल विधान परिषद से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। जिन्नाह जो बाद में एक सांप्रदायिक नेता के तौर पर उभरे कभी भारत के आम लोगों की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए इम्पीरियल विधान परिषद को लात भी मार सकते थे, यह जानकर सुखद एहसास होता है।

इस प्रदर्शनी में केंद्रीय खुफिया विभाग की अति गुप्त रिपोर्टों को भी पहली बार देश के सामने रखा गया। आमतौर पर शांत और अहिंसात्मक माने जाने वाले गुजरातियों ने रौलेट समिति के खिलाफ अहमदाबाद में अंग्रेज़ी  सत्ता के प्रतीकों की जिस तरह होली जलाई थी, वह जानने योग्य है।

प्रदर्शित गुप्त रिपोर्टों के अनुसार 11, 12 अप्रैल 1919 को अहमदाबाद में प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर के दफ्तर, नगर मजिस्ट्रेट, फ्लैग स्टाफ, अहमदाबाद जेल, मुख्य टेलीग्राफ केंद्र और 26 पुलिस चैकियों को आग लगाई थी। स्वयं अंग्रेजों की इस रिपोर्ट से यह बात साफ होती है कि अंग्रेज सत्ता के विरोध के केंद्र केवल बंगाल और पंजाब ही नहीं थे।

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का प्रतिरोध Resistance of Gurudev Ravindranath Tagore

इस प्रदर्शनी में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के अपने हाथ से लिखे उस मूल पत्र की प्रति भी दर्शकों के लिए उपलब्ध कराई गई, जो उन्होंने पंजाब में दमन के विरोध में ‘नाइट’की उपाधि त्यागने की घोषणा करते हुए वायसराय को लिखा था। इस पत्र में उन्होंने लिखा:

“समय आ गया है जबकि सम्मान के पदक वर्तमान अपमान के संबंध में हमारी लज्जा के प्रतीक बन गए हैं… और मैं अपनी ओर से खड़ा रहना चाहता हूं, हर प्रकार की विशिष्टता के बिना अपने देश के लोगों के साथ, जिनको साधारण आदमी होने के कारण एक ऐसा अपमान और जीवन सहना पड़ रहा है, जो इंसान के लिए किसी भी तरह स्वीकार योग्य नहीं है।”

सरकारी कर्मचरियों का प्रतिरोध 

भारत सरकार के गृह सचिव का इसी दौर का एक और रोचक पत्र भी यहां उपलब्ध कराया गया, जिससे पता लगता है कि सरकारी दमन के खिलाफ केंद्रीय सचिवालय के सरकारी कर्मचारियों ने भागीदारी की थी। इस गुप्त पत्र में गृह सचिव ने सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए यह भी लिखा कि सरकार की भद् पिटने के डर से अनुशासनात्मक कार्रवाई न की जाए।

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