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चौंकाने वाला सच , भयानक चेतावनी के साथ

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चौंकाने वाला सच , भयानक चेतावनी के साथ

भयानक चेतावनी
नई सरकार को मिलेगी बदहाल अर्थव्यवस्था

Ali Aadil Khan  Editor-in-Chief (Times Of Pedia Group)

क्या ही अच्छा होता कि 2019 के चुनाव से पहले मोदी जी के सकारात्मक कार्यों का बखान हो रहा होता ‘टाइम मैगज़ीन’ में , और जिसको मैगज़ीन ने भारत की सर्वोत्तम आशा (Best Hope) कहा था वो उम्मीद आज साक्षात्कार दिख रही होती .किन्तु दुर्भाग्यवश (बदक़िस्मती) से ऐसा नहीं होपाया .

ज़ाहिर है मोदी जी पर यह इलज़ाम भी आलोचकों और विश्लेषकों ने सही साबित करदिया कि मोदी जी ने 2019 लोक सभा चुनाव में वोट विकास और उपलब्धियों पर नहीं बल्कि देश की जनता को दुश्मन का फ़र्ज़ी ख़ौफ़ दिखा कर और देश के बहादुर जवानो की क़ुरबानी पर माँगा ,देश की जनता की भावनाओं को भड़का कर और राष्ट्रवाद के नाम पर माँगा .

आलोचकों का मानना है कि लगभग इसी प्रकार का राष्ट्रवाद हिटलर भी जर्मन की जनता के दिमाग़ में डालता रहा और 60 लाख जर्मन आमजन को अपनी सत्ता की हवस की भेट चढ़ा दिया .हिटलर कार्यकाल और RSS द्वारा प्रायोजित मोदी कार्यकाल को भी विश्लेषक समान मानते हैं .

अंतत्य: हिटलर का खेल 23 मई 1945 को समाप्त हो गया , अब संयोग से लोक सभा 2019 के चुनाव का नतीजा भी 23 मई को आना है , जिसमें एक काल के समाप्त होने की अटकलें लगाई जा रही हैं . सच्चाई तो 23 मई को ही पता चलेगी क्योंकि EVM इज़ बेस्ट होप फॉर पार्टी ,अभी बाक़ी है .

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डीवाईडर इन चीफ़ का मामला भी समझ लें

2015 की कवर स्टोरी में टाइम मैगज़ीन ने बताया था ‘वाई मोदी मैटर्स.’ हालांकि डिवाइडर इन चीफ़ पर बीजेपी ने कहा था कि यह टाइम मैगजीन द्वारा पीएम मोदी की छवि को धूमिल करने का प्रयास है.जबकि ‘मोदी इज़ इंडिआज़ बेस्ट होप ‘ पर बीजेपी की कोई मुख्य टिप्पणी नहीं आई थी , बीजेपी ने यह भी कहा था कि मोदी की छवि को धूमिल करने वाली स्टोरी के लेखक आतिश तासीर,पूर्व पाकिस्तानी नेता सलमान तासीर और पत्रकार तलवीन सिंह के बेटे हैं जिनका एजेंडा पाकिस्तानी है.याद रहे टाइम मैगज़ीन के लिए ‘why Modi matters’ 2015 में मोदी से लिए इंटरव्यू की टीम में Asia editor ज़ोहर अब्दुलकरीम भी शामिल था .

प्रधानमंत्री मोदी के इंटरव्यू की अहम बातों पर नज़र डालते हैं :

चीनी नेताओं जैसी तानाशाही पर
भारत एक लोकतंत्र है। यह हमारे डीएनए में है। जहां तक अलग-अलग राजनीतिक दलों की बात है, मेरी समझ से वे देशहित के बारे में अपने-अपने तरीके से सोचते हैं। अगर आप मुझसे पूछते हैं कि क्या भारत को चलाने के लिए तानाशाही चाहिए तो मैं कहूंगा बिल्कुल नहीं। अगर आप मुझसे लोकतांत्रित मूल्यों और धन, ताकत और प्रसिद्धि के बीच चुनने को कहते हैं तो मैं कहूंगा कि मैं लोकतांत्रिक मूल्य चुनूंगा।

सबसे पहली प्रेरणा पर
मेरे लिए गरीबी जीवन की सबसे पहली प्रेरणा रही है। गरीबी के ही चलते मैंने संकल्प किया था कि मैं अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जिऊंगा। मैं बहुत गरीब परिवार में पैदा हुआ। बचपन में मैं रेलवे के डिब्बों में चाय बेचता था। मेरी मां बर्तन मांजती थी और दूसरों के घरों में काम करती थी ताकि हमारा पेट भर सके। मैंने गरीबी को बहुत नजदीक से देखा है। मैं गरीबी में पला-बढ़ा हूं।

भारत में धर्म पर
मेरी, बीजेपी और सरकार की एक ही फ़िलॉसफ़ी है- सबका साथ, सबका विकास। जब भी अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ किसी ने नकारात्मक टिप्पणी की या कदम उठाया, हमारी सरकार ने उसे तुरंत दुरुस्त किया। (भले ही जुमले बाज़ी में हो {टॉप}) जहां तक सरकार की बात है, तो हमारे लिए एक ही पवित्र पुस्तक है, और वह है भारत का संविधान।{जिसकी कापियां जलाई जाती हैं और सर्कार खामोश देखती रहती है (टॉप )}

देश की एकता और अखंडता हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। सभी धर्मों और समुदायों को एक जैसे अधिकार हैं, और यह मेरी जिम्मेदारी है कि सबकी सुरक्षा हो। मेरी सरकार धर्म, जाति या पंथ के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को बर्दाश्त नहीं करेगी। {तभी देश देखते ही देखते धर्मों , वर्गों , जातियों और प्रांतों में बनता जा रहा है, नफरतों की खाई दिन ो रात चौड़ी होरही है (टॉप)}

आतंकवाद पर
हमें नेमप्लेट के आधार पर आतंकवाद को नहीं देखना चाहिए। हमें यह भी नहीं देखना चाहिए कि वे किस समूह या आतंकी संगठन से जुड़े हुए हैं, उनकी भौगोलिक स्थिति क्या है, उनके शिकार कौन लोग हैं। ये नाम और लोग बदलते रहेंगे। आज आप तालिबान या आईएसआईएस को देख रहे हैं, कल इनके नाम कुछ और होंगे।

हमें अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को लेकर यूएन के कन्वेंशन को पास करना चाहिए ताकि यह साफ-साफ पता चले कि आप किसे आतंकवादी मानते हैं या किसे नहीं। हमें आतंकवाद और धर्म को अलग करना होगा ताकि आतंकवादी धर्म के नाम का इस्तेमाल न कर सकें। कई देश आतंकवाद को कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्या मानते हैं। हमें इसे (आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई) इंसानी मूल्यों के लिए संघर्ष के रूप में देखना चाहिए।{जबकि आतंकवाद के झूठे इलज़ाम में हज़ारों बेगुनाह अल्पसंख्यक जेलों में बंद हैं , सैकड़ों का एनकाउंटर कराया गया है ,और आये दिन सरकारी अफसरों द्वारा धर्म और जाती के आधार पर भेदभाव की घटनाएं सामने आ रही हैं (टॉप)}

भारत में सरकार चलाने पर

मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मैं सरकार के संघीय ढांचे में पहली बार काम कर रहा था। अलग-अलग विभाग अलग-अलग तरीके से काम कर रहे थे, मानो वे अपने आप में एक सरकार हो। मेरी कोशिश यह रही है कि मैं इन विभागों के बीच की दीवारों को तोड़ सकूं ताकि समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक कोशिश की जा सके।

अमेरिका पर
यह मुद्दा नहीं है कि भारत अमेरिका के लिए क्या कर सकता है। मुद्दा यह भी नहीं है कि अमेरिका हमारे लिए क्या कर सकता है। हमें इस रिश्ते को इस तरह से देखना चाहिए कि भारत और अमेरिका एकसाथ दुनिया के लिए क्या कर सकते हैं…पूरी दुनिया में लोकतंत्र को मजबूत कर सकते हैं।{जबकि किसी भी पडोसी से रिश्ते बहाल नहीं हैं (टॉप )}

चीन के साथ तनाव के बारे में
तीन दशकों में भारत और चीन बॉर्डर पर तकरीबन शांति रही है। 25 सालों में सीमा पर एक भी गोली नहीं चली है। दोनों देश आर्थिक सहयोग के मोर्चे पर परिपक्वता दिखा रहे हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान के मजबूत होने पर
अमेरिका फौजों का अफगानिस्तान से हटना, अमेरिका का फैसला है। लेकिन अफगानिस्तान में स्थिर सरकार के हित में यह जरूरी है कि वहां की सरकार के साथ सुरक्षा जरूरतों को लेकर बातचीत की जाए।

भारत में आर्थिक सुधार पर
2014 से पहले कुछ भी नहीं हो रहा था। पूरी तरह पॉलिसी पैरालिसिस की स्थिति थी। कोई नेतृत्व नहीं था। मेरी सरकार के कार्यकाल को पिछली सरकार के 10 साल बनाम मेरी सरकार के 10 महीने के रूप में देखना चाहिए…पूरी दुनिया, एक बार फिर, भारत को लेकर उत्साहित है। आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और मूडी जैसी क्रेडिट एजेंसियां, सभी एक आवाज में कह रहे हैं कि भारत का आर्थिक भविष्य उज्ज्वल है।

Times of Pedia (Top) Views on Economic Growth
दिलचस्प आंकड़े
5 वर्ष गुजरने जाने के बाद आज भारत का GDP

मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल (2004-09) दूसरे की तुलना में बेहतर माना जाता है. इस कार्यकाल के आखिरी साल को छोड़ दें तो अर्थव्यवस्था को ज्यादा मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ा था. इस वजह से इन पांच सालों में तीन बार वृद्धि दर नौ फीसदी के पार गई थी.

इस दौरान हासिल की गई 9.6 फीसदी की विकास दर आजादी के बाद की सबसे तेज वृद्धि है.

हालांकि साल भर बाद अमेरिका में आ​ई आर्थिक मंदी से जब पूरी दुनिया प्रभावित होने लगी तो भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. इसका परिणाम यह हुआ कि मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल के आखिरी वित्त वर्ष 2008-09 में जीडीपी की वृद्धि दर घटकर 6.7 फीसदी ही रह गई.

सीएसओ के अनुसार यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के पांच सालों (वित्त वर्ष 2009-10 से 2013-14) के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर क्रमश: 6.7, 8.6, 8.9, 5.7 और 6.9 फीसदी रही थी. इस तरह यूपीए-2 के समय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर का औसत केवल 7.2 फीसदी था जबकि यूपीए-1 के दौरान यह 8.4 फीसदी था. इस तरह मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के 10 सालों में देश 7.8 फीसदी के औसत से विकास करने में सफल रहा था.

वाजपेयी सरकार के छह सालों (वित्त वर्ष 1998-99 से 2003-04 तक) की एक विशेष बात यह भी थी कि इस दौरान एक साल वृद्धि दर बढ़ती थी तो अगले साल यह घट जाती थी. वित्त वर्ष 1998-99 में 6.7 फीसदी से शुरू हुआ यह सिलसिला अगले पांच सालों में क्रमश: 8.0, 4.1, 5.4, 3.9 और 8.0 फीसदी तक पहुंचा था. इस तरह एनडीए-1 सरकार के दौरान देश की विकास दर का औसत 6.0 फीसदी रहा था.

इस तरह एनडीए-2 के चार साल यानी 2018 तक भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.1 फीसदी की औसत दर से तरक्की की है. इसमें एनडीए-1 की 6.0 फीसदी की विकास दर को मिला दें तो एनडीए की दोनों सरकारों के दौरान अर्थव्यवस्था 6.45 फीसदी की औसत गति से विकसित होने में सफल रही है.

लेकिन यह यूपीए की दोनों सरकारों के दौरान अर्थव्यवस्था की 7.8 फीसदी की औसत विकास दर से 1.35 फीसदी कम है. इसका मतलब यह हुआ कि एनडीए के शासन में अर्थव्यवस्था का विकास यूपीए के शासन की तुलना में करीब 14 फीसदी कम हो पाया.

भयानक चेतावनी
नई सरकार को मिलेगी बदहाल अर्थव्यवस्था

गौरतलब है कि जेएम फाइनेंशियल की रिपोर्ट ‘रूरल सफारी स्टील ऑन बंपी रोड’ में पहले ही कहा जा चुका है कि आम चुनाव के बाद दोपहिया और चार पहिया वाहनों जैसे विवेकाधीन उपभोग में थोड़ी वृद्धि की संभावना है, लेकिन बाजार समर्थित टिकाऊ रिकवरी धीरे-धीरे होगी, जोकि पूर्व अनुमान से ज्यादा मंद रहेगी. अगली सरकार को देश की बदहाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था विरासत में मिलने वाली है, क्योंकि देश की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के अनेक हिस्से अनौपचारिक क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें पिछले कई महीनों से अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा है और उन्हें उबरने में अभी समय लगेगा.

देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने ‘द चैलेंजेज ऑफ द मोदी-जेटली इकोनॉमी’ के विमोचन के मौके पर कहा कि नोटबंदी और जीएसटी लागू किये जाने से देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार मंद हुई. उन्होंने कहा कि बजट में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से राजस्व वसूली का लक्ष्य तर्कसंगत नहीं है. उन्होंने कहा, “बजट में जीएसटी से वसूली के लिए जो लक्ष्य रखा गया है, वह व्यवहारिक नहीं है. 

 

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