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गंगा माँ से शुरू कहानी सत्ता की

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गंगा माँ से शुरू कहानी सत्ता की

आस्था और सेवा की राजनीत के पाटों के बीच पिसती जनता

हमारे पाठकों को याद होगा जब प्रधान सेवक प्रधान मंत्री उम्मीदवार तय कर लिय गए और बनारस से सांसद चुनाव की पहली सभा को सम्बोधित कर रहे थे तो क्या कहा था ?आगे बताएँगे …

आगे बढ़ने से पहले हमारा अपने पाठकों से एक और सवाल है , सेवक को जनता की सेवा करना उसका धर्म है या कर्म कांडों में अपने समय को लगाना , किताबों में लिखा है “सेवा परमो धर्म” . ख़िदमत से ख़ुदा मिलता है , इबादत से जन्नत . लेकिन ख़ुदा मिल जाएगा तो जन्नत खुद बा खुद मिल जायेगी .

क्या जनता अपने अपने मुख्यमंत्री , मंत्री या सांसद से यह पूछने की ज़ेहमत गवारा करेगी , उसने अपने अपने सेवा कार्य काल में कितना समय जनता की सेवा में लगाया और कितना समय व्यर्थ गवाया . सेवा धरातल पर दिखती है . सच यह है अगर वास्तव में हमारा सांसद , विधायक , ईमानदारी से अपना समय और जनता का आवंटित (Allocated ) राशि (रक़म ) अपने अपने क्षेत्रों में लगादें तो इस बात को पूरे यक़ीन से कहा जासकता है कि देश चमक जाएगा ,जनता खुशहाल होजायेगी समाज में शान्ति और सुकून का माहौल होगा .

दुनिया की राजनीती में सत्ता धारी और विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप का खेल पुराना है , सत्ता पक्ष के झूठे वादे एवं दावे और विपक्ष की लम्बी खामोशी के बाद जनता और देश का बुरा हाल होजाना स्वाभाविक है .और इसके लिए खुद जनता भी ज़िम्मेदार है .

असल में विपक्ष का सत्तारूढ़ पार्टी को जनता के बुनयादी मसलों पर ना घेर पाने की वजह स्वयं सत्ता में रहते हुए जनता की बुनयादी और एहम ज़रूरतों को पूरा न कर पाना भी है .देश के नागरिक की बुनयादी ज़रूरतों में शिक्षा , स्वास्थ्य , सम्मान , सामजिक न्याय ,रोज़गार और सांप्रदायिक सोहाद्र है .

आप ने देखा इन मुद्दों पर विपक्ष आजतक कोई बड़ा आंदोलन नहीं कर सकी है. गाय , गोबर , गोश्त , लव जिहाद , एंटी रोमियो ,तीन तलाक़ , मंदिर , मस्जिद और समलैंगिक जैसे फ़ुज़ूल मुद्दों में विपक्ष उलझा हुआ है और TV Channels दिन ओ रात व्यर्थ मुद्दों पर बहस किये जारहे हैं , सिवाए कुछ को छोड़कर , जबकि ये सभी issues किसी भी देश के मुद्दे नहीं होते .देश का संविधान इतना उम्दा है कि इसपर इंसाफ से अमल होजाये और एजेंसीज ईमानदारी से उसको अमल करवादें तो कहीं कोई मसला ही नहीं है .

अगर हक़ीक़त में सत्ता पक्ष और विपक्ष आस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर गंभीर हैं तो उनको सबसे ज़्यादा बहस , आंदोलन और चर्चा , गंगा की सफाई के सम्बन्ध में करना चाहिए थी ,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट और हिंदुओं के लिए बहुत बड़ी धार्मिक मान्यता रखने वाले वाराणसी शहर की जिस तस्वीर को ‘गंगा की सफ़ाई का सबूत’ बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया,वह वास्तव में जनता के साथ बड़ा धोखा है .यह सब फोटो शॉप या फेक प्रचार है .जिससे शायद पार्टी का वक़्ती तौर पर भला होजाये मगर देश या जनता का भला होने का सवाल ही पैदा नहीं होता

फोटो

बीते वर्ष गंगा की सफ़ाई के लिए सरकार के प्रयासों का मूल्यांकन करने वाली एक संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि गंगा सफ़ाई के लिए सरकार द्वारा उठाए गए क़दम पर्याप्त नहीं हैं.वहीं नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल भी गंगा की सफ़ाई को लेकर सरकार को फटकार लगा चुका है.

पिछले साल 112 दिन तक अनशन पर बैठने वाले पर्यावरणविद् प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल उर्फ़ स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद ने अपना जीवन गंगा की सफ़ाई के लिए ही दे दिया था.उनका कहना था की सरकार का गंगा सफाई के सम्बन्ध में लापरवाही का रुख शर्मनाक है और अफसोसनाक भी .

अनशन के दौरान जीडी अग्रवाल ने कहा था, “हमने प्रधानमंत्री कार्यालय और जल संशाधन मंत्रालय को कई सारे पत्र लिखे, लेकिन किसी एक का भी जवाब तक नहीं दिया गया .” जिस गंगा को हमारे देश में अपनी माँ का दर्जा दिया जाता है ,उसी के साथ छल अत्यंत शर्मनाक है .

कैसी विडंबना है कि भारत में संतों को गंगा की सफाई के लिए अनशन करते हुए जान की बाजी लगानी पड़ती है ।

 

स्वयं मोदी जी 2014 में बतौर सांसद प्रत्याशी गंगा को नमन करते हुए कहते हैं “न मैं यहाँ ख़ुद आया हूँ, न कोई मुझे लाया है, मुझे तो माँ गंगा ने बुलाया है.”

हालांकि पीएम मोदी ने सत्‍ता में आने के बाद पहले ही वर्ष में गंगा सफ़ाई को लेकर गंभीरता दिखाते हुए गंगा संरक्षण मंत्रालय बनाया था , और इसकी सफ़ाई के लिए 3,867 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गयी थी ,यह जानकारी जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण राज्य मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने जुलाई 2018 में राज्यसभा में दी थी.कितना विरोधाभास है गंगा मय्या की सौगंध लेने वालों की कथनी और करनी में जनता खूब जानती है .

भिन्न भिन्न आस्थाओं और भाग्य पर आधारित भारतवर्ष के सेवको या प्रधान सेवक को जनता की  उम्मीदों से खिलवाड़ करना कितना खतरनाक होसकता है शायद इसका आभास अभी खुद इनको भी नहीं है ।

बक़ौल प्रधान सेवक के “70 साल में कांग्रेस ने क्या किया ” हालांकि पूरे 70 साल  कांग्रेस हकूमत के नहीं हैं , अगर मोदी जी इस वक्तव्य को सच मान लें तो यह उनके लिए विचारणीय सबक़ है । जनता की आस्थाओं और विश्वास के साथ छल करने वाली , भले ही देश को आज़ादी ए जंग में अगुवाई करने वाली 150 वर्ष पुरानी पार्टी क्यों न हो,     जनता धूल चटा देती है तो दूसरी जमातों कि क्या हैसियत है , जिनका देश कि आज़ादी से भी कोई लेना देना न रहा हो .

सत्ता का आधार सच और इन्साफ पर केंद्रित होता है , जबकि आजकी सियासत झूट , पाखण्ड , अन्याय , अत्याचार , भेद भाव , पक्षपात और नफ़रत पर आधारित है जो स्थाई हो ही नहीं सकती . क्योंकि हुकूमत ज़मीनो से नहीं आसमानो से संचालित होती है , और हुक्मरान , जनता के अमल के आधार पर बदले जाते हैं , जनता जितनी आध्यात्मिक , इंसाफ़ पसंद और ईमानदार होगी हुक्मरान और बादशाह भी उतने ही रहम दिल , न्यायप्रय और वफ़ादार होंगे .

कुल मिलाकर , गंगा , गाय , गोबर ,गोश्त और वन्दे मातरम् पर राजनीत करने वाली पार्टियां इन्ही मुद्दों के साथ वफ़ादार होजायें तो भी शायद उनका काम चल सकता है , मगर याद रहे आस्था का सम्बन्ध मज़हब , जाती , खान पान , क्षेत्र , रंग रूप से नहीं होता बल्कि आस्था तो आत्मा और परमात्मा (बन्दे और रब ) के बीच उस अटूट रिश्ते का नाम है जो किसी भी समय एक दुसरे से जुदा हो ही नहीं सकता .

और यही रिश्ता रब की तमाम सृष्टि (मख्लूक़ ) से मोहब्बत सिखाता है .गंगा , जमुना ,सरस्वती , पृथ्वी , आकाश , जल , पेड़ पौधे , इंसान ,पत्थर ,जानवर सब उस रब की मख्लूक़ है जो हमेशा से है और हमेशा रहेगा .

दर्द ए दिल के वास्ते पैदा किया इंसान को
वर्ना ताअत (इबादत ) के लिए कम न थे कर्रो बियाँ (फ़रिश्ते)

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