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कमल को कमल से मात का प्लान , नाथ को विजय का समर्थन

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कमल को कमल से मात का प्लान , नाथ को विजय का समर्थन

देश में हमेशा की तरह चुनावी माहौल अपने पूरे तापमान के साथ आम नागरिक को झुलसाने के लिए तैयार है , ज़ाहिर है की चुनावों का सारा भार आम जनता पर ही पड़ता है ऐसे में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही कांग्रेस ने प्रदेश में बड़ा बदलाव करते हुए पार्टी सीनियर लीडर और पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। कांग्रेस की ओर से यह सिर्फ बदलाव नहीं है बल्कि चुनाव से पहले सूबे में समीकरण साधने की एक बड़ी हिकमत भी है।कमल को कमल से मात देने के इस प्लान में नए अध्यक्ष कमल नाथ को ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजा दिग्विजय का समर्थन हासिल है .

 

छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ ने जिम्मेदारी को लेकर गुरुवार को इकनॉमिक टाइम्स से कहा, ‘मैं इसे एक बड़ी जिम्मेदारी और एक बेहतर अवसर के तौर पर लेता हूं।’ राज्य में इस साल के अंत तक चुनाव होने हैं और उससे पहले शिवराज सरकार से मुकाबले के लिए कांग्रेस ने अरुण यादव को हटाकर कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष का जिम्मा सौंपा है।

 

कांग्रेस की 15 साल बाद सूबे की सत्ता में वापसी को अपना मिशन बताते हुए कमलनाथ ने कहा, ‘बीते कई सालों में मध्य प्रदेश में गवर्नेंस और प्रशासन के स्तर पर कोई सुधार नहीं हुआ है। यहां हालात जस के तस बने हुए हैं। अब बदलाव का समय आ गया है।’ उधर  शिवराज सिंह चौहान लगातार चौथे कार्यकाल के लिए इस बार इसको बड़ी चुनौती के तौर पर लेंगे ।कमल नाथ अभी तक हरियाणा के प्रभारी महासचिव रहे अब सूबे के मुखिया होंगे, जबकि इस पद के लिए रेस में बताए जा रहे सिंधिया को कैंपेन कमिटी का चेयरमैन बनाया गया है।

 

 

हालांकि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश के लिए अपने सीएम कैंडिडेट का ऐलान नहीं किया है, लेकिन कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से इस बात के इमकान बढ़ गए हैं की वोही कांग्रेस के CM पद के सबसे अहम चेहरा होंगे। अब तक इस मसले पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आई है, लेकिन कमलनाथ को कमान सौंपे जाने को सिंधिया कैंप के लिए झटका माना जा रहा है।

 

इन पांच वजहों से कमलनाथ को सौंपी गई कमान

पार्टी नेताओं का कहना है कि 5 वजहों से 71 वर्षीय कमलनाथ को यह जिम्मेदारी दी गई है। पहला, उनका गुटबाजी से परे का नेता होगा। वह गुटों में बंटी स्टेट यूनिट को एक साथ लाकर मिशन को आगे बढ़ सकते हैं। दूसरा, चुनावों में प्रदेश कांग्रेस के लिए संसाधन जुटाने की क्षमता। तीसरा, सत्ता के गलियारों का अनुभव। चौथा, जाति के तौर पर न्यूट्रल फेस। उनके पक्ष में पांचवां और सबसे अहम बिंदु यह है कि उन्हें पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह का भी रणनीतिक तौर पर समर्थन हासिल है। यह समीकरण इसलिए बेहद अहम है कि दिग्विजय सिंह को साधने से गुटबाजी कम होगी।

 

कमलनाथ के सामने चुनौतियां

सूबे में पहली बार प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारी संभालने वाले कमलनाथ के सामने पार्टी के सभी गुटों को साथ लाने की भी चुनौती होगी। खासतौर पर कांग्रेस के खोए हुए सामाजिक आधार को वापस दिलाना बड़ा टास्क होगा। मुख्य तौर पर सवर्ण जातियां कांग्रेस की बजाय बीजेपी पर अधिक भरोसा दिखाती आई हैं, लेकिन ऐंटी-इन्कम्बैंसी की लहर को मजबूत करने के लिए पार्टी को उनकी जरूरत होगी। इस चुनाव में कमलनाथ पर मोदी-शिवराज और शाह की तिकड़ी से निपटने की भी चुनौती होगी।

 

कांग्रेस के सियासी पंडित दिग्विजय कमलनाथ को मिलेगा समर्थन

कमलनाथ ने पद मिलने के बाद कहा था, ‘पार्टी के मेरे सभी सीनियर लीडर्स के साथ मेरे अच्छे संबंध हैं। हम एक टीम के तौर पर काम करेंगे।’ दिग्विजय सिंह ने छह महीने तक सूबे के बड़े हिस्से में नर्मदा परिक्रमा यात्रा निकाली थी। माना जा रहा था कि उन्हें अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है, लेकिन पार्टी के आंतरिक सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में राहुल गांधी, कमलनाथ, दिग्विजय और सिंधिया के बीच मीटिंग हुई, जिसमें दिग्विजय ने कमलनाथ को चुनावी राज्य के लिए सबसे बेहतर नेतृत्व करार दिया। ऐसे में यह तय है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश में कांग्रेस की विजय के लिए कंधे से कन्धा मिलाकर काम करेंगे ।top bureau

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