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उसके पसीने और खून की यह रौनक़ है …जो तुम आज

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Ali Aadil khan

भारत माता है या पिता अब यह नई बहस शुरू होगई है ,बीफ क्या है और गाए क्या है ,कौन देश का नागरिक है और और कौन किराएदार . मछली वेज है या नॉन वेज ,भारत अखण्ड कोनसा है और खंडित कोनसा ,देश भक्त कौन है देश द्रोह कौन ?वाह क्या बात है निकम्मों की, बहस भी तो ऐसी शुरू करते हैं जिसका देश या जनता के विकास से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं सिवाए विनाश के।

जिस देश में आज भी ८४ करोड़ मज़दूर रह रहा हो ,जहाँ देश का ४८% हिस्सा आज भी अँधेरे में डूबा हो , जिस देश में लोग प्यास और भूक से मर रहे हों , जहाँ कुपोषण ,भुकमरी,ग़रीबी ,बेरोज़गारी चिंता का विशय हो ऐसे में असहिष्णुता और सहिष्णुता ,भारत माता या पिता जैसी बहस बेमानी लगती है और ऐसा लगता है की जान बूझकर जज़्बाती इश्यूज को छेड़ा जाता है ताकि सरकारें और विपक्ष अपनी अपनी नाकामी पर पर्दा ड़ाल सकें !

देश की जनता को चाहिए की वो पाखंडियों की नाकामिों , निकम्मेपन पाखण्ड और असफलताओं से पर्दा हटाएं और उनको शीशा दिखाए की होश में आओ वर्ना एक रोज़ मिटटी और मैला ढोने वाले मज़दूर और भूकी जनता तुम्हारे महलों और मकानों की ईंटों को उखाड़ लेजाएगी और शीशे की मकानों को चकना चूर कर देगी सफ़ेद कपडे पहने काले दिल वालो (सब नहीं) होश में आओ ,और यहाँ बच भी निकले तो याद रखो आँख की पुतली में आसमान दिखाने वाला ,दिल को धड़कने और फेपदे को फड़कने वाला ,आसमान को टांगने वाला ,ज़मीन को बिछाने वाला ,सूरज को दहकने वाला ,काली रात में काले पहाड़ पर काली चींटी के चलने की आवाज़ को सुनने और देखने वाला ,दिन से रात को और रात से दिन को निकालने वाला ,मुर्दा से ज़िंदा और ज़िंदा से मुर्दा को पैदा करने वाला प्रभु हमारा रब सब कुछ देख रहा है और एक रोज़ तमाम इंसानो से उनके किये कर्मों का हिसाब लगा , परलोक इसी लिए रखा गया है ,वहां कैसे बचोगे ?

भगतसिंह का मानना था कि देश का अर्थ कोई काग़ज़ी नक्शा नहीं। देश को मातृभूमि या पितृभूमि कहने या कहलवाने से काम नहीं चलेगा। माँ या पिता वे होते हैं जो बच्चे को भोजन, वस्त्र और शरण देते हैं। ऐसे में देश और देशभक्ति का अर्थ क्या है? देश के सच्चे माँ और पिता कौन हैं? वे जो देश को रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया कराते हैं।या वो जो ज़िंदा की रोटी और मुर्दा का कफ़न छीन लेते हैं जिनको आप अच्छी तरह जानते हैं ।इस देश के 84 करोड़ मज़दूर, मध्यवर्ग और ग़रीब किसान जो कि महँगाई, बेरोज़गारी, सूखे, अम्बानियों-अदानियों की लूट और सरकारी दमन का शिकार हो आत्महत्याएँ करने को मजबूर हैं। ये वे लोग हैं जो देश में सुई से लेकर जहाज़ तक बना रहे हैं।

अगर ‘देश’, ‘राष्ट्र’, ‘भारत माता’, या ‘हिन्द’, जैसे विशाल शब्दों का कोई सच्चा अर्थ है, तो वह ये ही लोग हैं! भगतसिंह का मानना था की देश का अर्थ येही मज़दूर, आम मेहनती लोग और किसान हैं।हालांकि विद्वानों ,ऋषि मुनि और पीर फ़क़ीरों की अपनी एक एहमियत है । ऐसे में देशभक्ति का अर्थ क्या हुआ? यह कि इस अन्न पैदा करने वाले , वस्त्र बनाने वाले , माकन और इमारतें बनाने वाली ग़रीब जनता को ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई और पूँजीपतियों की गुलामी से मुक्ति मिले। तथा उनको उनका अधिकार मिले ।भगतसिंह ने इसीलिए कहा था कि हमारे लिए आज़ादी का मतलब केवल अंग्रेज़ों से आज़ादी नहीं है, बल्कि इस देश के मज़दूरों और किसानों को हर प्रकार की लूट और शोषण से आज़ादी दिलाना है।

आखिर प्रोफेट मुहम्मद (स.अ.व्.) ने क्यों कहा की मज़दूर की मज़दूरी उसके पसीना खुश्क होने से पहले अदा करदो।क़ुरान में रब का इरशाद है की मुझे ईमानदार मज़दूर के हाथ बहुत पसंद हैं ।सच्ची बात है दुनिया में रौनक़ मेहनत कशों  , मज़दूरों ,सेवकों और ईमान वालों की है वरना बे  ईमान और अमीर लोग इस दुनिया को कूड़ा घर या जहन्नुम  बना  दें ।EDITOR’S DESK

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