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2017: नफरत, दुस्साहस और पहचान की राजनीति का साल

08.01.2018

 

-सीएसएसएस टीम

(इरफान इंजीनियर, नेहा दाभाड़े, सूरज नायर)

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सेंटर फार स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म (सीएसएसएस) द्वारा देश में साम्प्रदायिक हिंसा और तनाव की घटनाओं पर निरंतर नजर रखी जाती है। सीएसएसएस के अध्ययन से पता चलता है कि प्रिंट मीडिया व वेब पोर्टलों पर साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं की रपटों में सन् 2016 की तुलना में सन् 2017 में कमी आई है। परंतु धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण बढ़ा है और हिन्दू श्रेष्ठतावादियों द्वारा मुसलमानों और ईसाईयों के विरूद्ध घृणा-जनित अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है। इस तरह के हमलों को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए, गोरक्षा और लव जिहाद को मुद्दा बनाया गया। गाय को एक पवित्र प्रतीक का दर्जा दे दिया गया और गोरक्षा को राष्ट्रवाद से जोड़ने के प्रयास हुए। राज्य द्वारा ऐसे प्रकरणों में अपराधियों के विरूद्ध समुचित, व कुछ मामलों में कोई भी कार्यवाही, न किए जाने से ऐसे तत्वों की हिम्मत बढ़ी। हिन्दू श्रेष्ठतावादी, बिना किसी भय के अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं और इससे भी बुरी बात यह है कि वे अपनी कुत्सित हरकतों को न केवल औचित्यपूर्ण ठहरा रहे हैं वरन् उनका महिमामंडन भी कर रहे हैं। यह इसलिए संभव हो सका है क्योंकि राज्य उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन दे रहा है। नतीजे में ईसाईयों और मुसलमानों में असुरक्षा के भाव में बढ़ोत्तरी हुई है, उनके दानवीकरण की प्रक्रिया तेज हुई  है और समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण और गहरा हुआ है।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, सन् 2017 में सितंबर माह तक साम्प्रदायिक हिंसा की 296 घटनाएं हुईं, जिनमें 44 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, सन् 2014 और 2015 में साम्प्रदायिक हिंसा की क्रमश: 703 और 751 घटनाएं हुईं थीं, जिनमें 86 व 97 लोग मारे गए थे। सबसे ज्यादा (60) घटनाएं उत्तरप्रदेश में हुईं। इसके बाद कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल का नंबर था। गृह मंत्रालय, साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं के आंकड़े राज्य सरकारों के जरिए  इकट्ठा करता है और राज्य सरकारें, पुलिस थानों से ये आंकड़े संकलित करती हैं। साम्प्रदायिक हिंसा की जो घटनाएं देश भर में होती हैं, उनमें से बहुत कम की खबरें मीडिया में प्रकाशित होती हैं। सन्  2016 के बाद से केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं से संबंधित आंकड़े जारी करना बंद कर दिया है। अतः अब यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं है कि देश भर के थानों में ऐसी कितनी घटनाओं की रपट दर्ज की गई। सीएसएसएस के आंकड़े, साम्प्रदायिक घटनाओं की मीडिया में छपी रपटों पर आधारित हैं।

सीएसएसएस, आंकड़े संकलित करने के लिए पांच समाचारपत्रों में छपी रपटों को संज्ञान में लेता है। वे हैः ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘, ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया‘, ‘द हिन्दू‘, ‘सहाफत‘ और ‘इंकलाब‘ के मुंबई संस्करण। जहां सन् 2015 में केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 751 घटनाएं हुईं, जिनमें 97 लोग मारे गए और 2,264 घायल हुए, वहीं इन पांच समाचारपत्रों में केवल 47 घटनाओं की रपट छपी, जिनमें 15 लोग मारे गए और 272 घायल हुए। इससे यह पता चलता है कि प्रिंट मीडिया द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं को किस हद तक नजरअंदाज किया जाता है। हर वर्ष की तरह, सन् 2017 में भी सीएसएसएस ने साम्प्रदायिक हिंसा संबंधी आंकड़ों के संकलन के लिए उपरोक्त तीन अंग्रेजी और दो उर्दू दैनिकों के पूरे साल के सभी अंकों का अध्ययन किया।

इन पांच दैनिक समाचारपत्रों के अनुसार, सन् 2017 में देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 43 घटनाएं हुईं, जिनमें सात लोग मारे गए और 136 घायल हुए। इसकी तुलना में 2016 में ऐसी 62 घटनाएं हुईं और उनमें मरने वालों और घायल होने वालों की संख्या क्रमश: 8 और 676 थी।

जो सात लोग मारे गए, उनमें से दो हिन्दू थे और चार मुसलमान। एक व्यक्ति का धर्म अज्ञात है। जो लोग गिरफ्तार किए गए, उनमें से 17 हिन्दू थे और 31 मुसलमान।

इस तरह, हर साल की तरह, 2017 में भी साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार होने वालों में हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों की संख्या अधिक थी और इस तथ्य के बावजूद, गिरफ्तार किए गए लोगों में भी मुसलमान ज्यादा थे। नेशनल क्राईम रिकार्डस ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, देश में विचाराधीन कैदियों में मुसलमानों का प्रतिशत 20.9 है, जो कि आबादी में उनके प्रतिशत से कहीं ज्यादा है। मुसलमानों का बढ़ता अपराधीकरण भी साम्प्रदायिक हिंसा के प्रकरणों में न्यायपालिका के रूख को प्रभावित करता है।

इन 43 घटनाओं में से 17 उत्तरप्रदेश में हुईं, सात महाराष्ट्र में, चार गुजरात में और तीन-तीन बिहार और राजस्थान में। 43 घटनाओं में से 34 भाजपा- शासित प्रदेशों में हुईं, एक कांग्रेस-शासित प्रदेश में और आठ अन्य पार्टियों द्वारा शासित प्रदेशों में। सन् 2017 में, भाजपा 18 राज्यों में शासन में थी, कांग्रेस का पांच राज्यों में शासन था और दस राज्यों में इतर पार्टियों की सरकारें थीं।

साम्प्रदायिक हिंसा का बदलता स्वरूप  

सन् 2014 के बाद से, साम्प्रदायिक हिंसा के स्वरूप में परिवर्तन स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है। सन् 2014 के पहले तक, किसी समुदाय या किसी इलाके के सभी लोगों को उनकी किसी कथित भूल की सजा देने के लिए सामूहिक रूप से निशाना बनाया जाता था। भाजपा के शासन में आने के बाद से, मुसलमानों के खिलाफ मुख्यतः व्यक्तिगत हिंसा की जा रही है। यह हिंसा अक्सर लव जिहाद और गोरक्षा के बहाने की जाती है। अधिकांश मामलों में भीड़ द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है या उनके खिलाफ घृणा-जनित अपराध किए जाते हैं। हिन्दुत्ववादी संगठनों को कानून का तनिक भी भय नहीं है और अधिकांश मामलों में राज्य, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें समर्थन व सहयोग प्रदान करता है। दोनों समुदायों के व्यक्तियों के बीच मामूली विवादों को साम्प्रदायिक रंग दे दिया जाता है और व्यक्तिगत झगड़े, साम्प्रदायिक हिंसा का रूप ले लेते हैं। यही सन् 2014, 2015 और 2016 में भी हुआ था। साम्प्रदायिक हिंसा के स्वरूप में इस परिवर्तन के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  1. कार्यप्रणाली में परिवर्तन

पिछले कुछ वर्षों में हिंसा करने के तरीके में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। सन् 2014 के पहले तक, अक्सर, अल्पसंख्यकों को सामूहिक रूप से निशाना बनाया जाता था। इसके विपरीत, सन् 2017 में, मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाया गया। इस अर्थ में यह नियंत्रित हिंसा थी और बड़े पैमाने पर नहीं की गई। इस हिंसा को अंजाम दिया खून की प्यासी भीड़ों ने और इसे औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए साम्प्रदायिक विमर्श का इस्तेमाल किया गया। इस संबंध में जो सबसे व्यथित करने वाली बात है वह यह है कि सार्वजनिक स्थानों पर दिन-दहाड़े क्रूरतापूर्वक लोगों को मौत के घाट उतारा गया। लोगों की जान लेने को एक तमाशा, एक खेल बना दिया गया। सन् 2017 में हिंसक भीड़ द्वारा 15 लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और ऐसी घटनाओं में 49 लोग घायल हुए। इन 49 घायलों में से 38 मुसलमान थे और 11 का धर्म स्पष्ट नहीं है। सन् 2017 में भीड़ द्वारा हिंसा की कुल 23 घटनाएं हुईं।

इन 23 घटनाओं में से 21 गाय से जुड़ी थीं। उत्तरप्रदेश के फरीदाबाद में पोलियो ग्रस्त आटोरिक्शा चालक आजाद और उनके साथ एक नाबालिग लड़का, अपने आटो में भैंस का मांस लादकर फतेहपुर से पुराने फरीदाबाद जा रहे थे। रास्ते में बजरी गांव के पास कार में सवार छःह लोगों ने उन्हें रोक लिया और उनके साथ मारपीट की। पुलिस ने इस घटना के सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया। इनके नाम थे लखन, दिलीप और रामकुमार। गिरफ्तारी के कुछ ही घंटों बाद इन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। आजाद का यह आरोप है कि ये लोग बजरंग दल के कार्यकर्ता थे और वे उसे पुलिस की मौजूदगी में भी पीटते रहे।

एक अन्य घटना में पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के धूपगुड़ी ब्लाक में 27 अगस्त की सुबह, दो लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। ऐसा संदेह था कि वे गायों की तस्करी कर रहे थे। गांव वालों ने देखा कि एक पिकअप, जिसमें कुछ गायें हैं, इलाके में घूम रही है। जब गांव वालों ने वेन में सवार लोगों को ललकारा तो उन्होंने भागने का प्रयास किया। परंतु गांव वालों ने पीछा कर वेन को पकड़ लिया और उसमें से निशाना शेख और हुसैन को खींचकर बाहर निकाला और उनसे कुछ प्रश्न पूछने के बाद उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। उनमें से एक के पिता, महादुल हुसैन ने बताया कि दोनों से पचास हजार रूपयों की मांग की गई और जब उन्होंने यह धन देने से इंकार कर दिया तब उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया। इस सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया। 23 में से दो अन्य घटनाएं, अंतर्धार्मिक विवाह और एक मुसलमानों द्वारा अपने सिर पर रूमाल बांधने के मुद्दे पर हुई। बुलंदशहर में 2 मई को एक 60 वर्षीय व्यक्ति की एक भीड़ ने इस संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी कि उसने दो अलग-अलग धर्मों के लड़के और लड़की को घर  से भागने में मदद की थी। फजलपुर का रियासुद्दीन अहमद, दूसरे धर्म की एक लड़की के साथ भाग गया था। इससे इलाके में जबरदस्त तनाव था। हिन्दू युवा वाहिनी के सदस्य उसे धमकी दे रहे थे क्योंकि उनका ख्याल था कि उसे पता है कि लड़का और लड़की भागकर कहां गए हैं। 2 मई को वाहिनी के सदस्यों ने एक बार फिर उससे घर छोड़कर भागे युगल का पता पूछा। जब वह उनके सवालों का उत्तर नहीं दे सका तो उसे बेरहमी से लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला गया। एक दूसरी घटना में गुलजार अहमद, मोहम्मद इसरार और अबू बक्र को ट्रेन में उनके सहयात्रियों ने इसलिए पीटा क्योंकि उन्होंने अपने सिर पर रूमाल बांध रखे थे।

  1. पीड़ितों पर राज्य का कहर

इस साल भी पीड़ित, राज्य के कहर के शिकार बनते रहे। राज्य का यह कर्तव्य है कि वह हिंसा करने वालों को सजा दिलवाए ताकि दूसरों को सबक मिल सके। इसकी जगह, राज्य, हिंसा के पीड़ितों को ही कटघरे में खड़ा कर रहा है। अर्थात, पीड़ित पहले साम्प्रदायिक तत्वों का शिकार बनते हैं, और फिर राज्य का। महाराष्ट्र में मांस के दो व्यापारियों की मालेगांव में गोरक्षकों के एक समूह ने पिटाई की। उन्हें यह संदेह था कि वे बीफ का परिवहन कर रहे थे। इस घटना के वीडियो फुटेज से यह साफ  है कि उन दोनों के साथ गाली-गलौज की जा रही है और उन्हें तमाचे मारते हुए उनसे कहा जा रहा है कि वे जय श्रीराम का नारा लगाएं। इस सिलसिले में नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया परंतु मांस के दोनों व्यापारियों के विरूद्ध भी ‘धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने‘ का प्रकरण कायम किया गया।

अलीगढ़ में गोरक्षकों ने पांच व्यक्तियों की इसलिए पिटाई लगा दी क्योंकि उनका दावा था कि वे गांधी पार्क क्षेत्र में एक निजी डेयरी में एक भैंस का गैर-कानूनी ढंग से वध कर रहे थे। डेयरी का मालिक कालू बघेल, पन्नागंज में डेयरी चलाता था। उसके यहां पली एक भैंस ने जब दूध देना बंद कर दिया तब उसने उसे बेचने का निर्णय लिया। मवशियो के एक व्यापारी इमरान ने भैंस को खरीदने का प्रस्ताव दिया परंतु इस शर्त के साथ कि कालू बघेल उसे डेयरी में ही भैंस का वध करने की इजाजत दे। जब इमरान सहित चार अन्य कसाई भैंस को डेयरी के प्रांगण में काट रहे थे, उसी समय कुछ लोग वहां घुस आए और उन्होंने इन सबकी पिटाई लगा दी। पुलिस ने इन पांचों के साथ-साथ डेयरी के मालिक को भी अवैध रूप से पशु वध करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया परंतु हमलावरों के खिलाफ कोई प्रकरण पंजीबद्ध नहीं किया।

  1. राज्य की प्रतिक्रिया

ऐसी घटनाओं को राज्य बहुत हल्के ढंग से ले रहा है। लक्षित हिंसा को नजरअंदाज करना, कानून लागू करने वाली किसी भी एजेंसी के लिए उचित नहीं कहा जा सकता। राज्य की प्रतिक्रिया में कई स्तरों पर कमी है। एक ओर इस तरह के कानून लाए जा रहे हैं जिनसे अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करना आसान हो गया है तो दूसरी ओर इस तरह की घटनाओं की जांच बहुत लापरवाही से की जा रही है, जिसके नतीजे में, अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती। ये प्रतिक्रियाएं और नीतियां, शासक दल की विचारधारा और उसके एजेंडे के अनुरूप हैं। इसी विचारधारा के चलते, शासक दल के वे सदस्य, जो संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ले चुके हैं, भी मुसलमानों, ईसाईयों और दलितों के साथ भेदभाव की बात कहते हैं। देश पर एक संस्कृति लादने का प्रयास भी हो रहा है। उदाहरणार्थ, अब, गोरक्षा संबंधी कानून, देश के जिन इलाकों में लागू हैं, उनमें 99 प्रतिशत भारतीय निवास करते हैं।

जहां आरएसएस नेताओं की हत्या की जांच एनआईए करती है, वहीं घृणा-जनित अपराधों में निर्दोष नागरिकों के मारे जाने को हल्के में लिया जाता है और ऐसे प्रकरणों की जांच में लापरवाही और लेतलाली की जाती है। उदाहरणार्थ, पहलू खान की अलवर, राजस्थान में स्वनियुक्त गोरक्षकों के समूह ने क्रूरतापूर्वक पिटाई की। उस पर यह आरोप था कि वह वध के लिए गायों का परिवहन कर रहा था। अपने मृत्यु पूर्व बयान में खान ने छःह व्यक्तियों का नाम लेकर उन्हें हमलावर बताया। उनमें से तीन एक दक्षिणपंथी संगठन से जुड़े थे। सभी को क्लीन चिट दे दी गई और उनके खिलाफ प्रकरण को राजस्थान पुलिस ने बंद कर दिया। जांच केवल इस बात की हुई कि क्या पहलू खान पशुओ की अवैध तस्करी कर रहा था।

इस घटना़क्रम का सबसे खतरनाक पहलू, जो इस तरह की घटनाओं को न केवल बढ़ावा देता है वरन् उन्हें औचित्यपूर्ण भी ठहराता है, वह है संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और सत्ताधारी दल के नेताओं के वक्तव्य और भाषण। उदाहरणार्थ, भाजपा विधायक संगीत सोम का दावा है कि ताजमहल का भारतीय संस्कृति में कोई स्थान नहीं है और यह भी कि ताजमहल का निर्माता, भारत की भूमि से हिन्दुओं का सफाया करना चाहता था। प्रधानमंत्री भी मुगल बादशाहों के बारे में अपमानजनक ढंग से बात करते हैं। उन्होंने कांग्रेस पर ‘‘मुगलों जैसी मानसिकता‘‘ रखने का आरोप लगाया। कर्नाटक में टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यह शर्मनाक है कि हनुमान की जगह टीपू सुल्तान की पूजा की जा रही है। इस तरह की बातों से इस सोच को बढावा मिलता है कि मुसलमान इस देश के दोयम दर्जे के नागरिक हैं और उन्हें प्रताड़ित किया जाना और उनके साथ भेदभाव उचित है।

साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों में पुलिस की भूमिका हमेशा से संदेह के घेरे में रही है। यह साफ है कि पुलिस कुछ समुदायों के विरूद्ध पूर्वाग्रह ग्रस्त है। इसके साथ-साथ, उसका हिन्दू श्रेष्ठतावादियों के साथ जुड़ाव है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब पुलिस ने कानून का मखौल बनाते हुए, हिन्दुत्व संगठनों को मनमानी करने की छूट दी। पहलू खान के मामले में साध्वी कमला को पुलिस हिरासत में आरोपियों से मिलने की इजाजत दी गई, जो कि गैरकानूनी था। उन्होंने पहलू खान को पीट-पीटकर मारने वाले आरोपियों की तुलना भगतसिंह से की। स्पष्टतः इस तरह के वक्तव्यो से आमजन हिंसा को सामान्य और औचित्यपूर्ण मानने लगते हैं और गाय जैसे प्रतीकों पर केन्द्रित राष्ट्रवादी विमर्श को प्रोत्साहन मिलता है। इसके विपरीत, पुलिस आरोपियों के विरूद्ध मजबूत प्रकरण तैयार नहीं करती, जिसके कारण वे अदालतों से बरी हो जाते हैं। उत्तरप्रदेश में मजनू दस्ते-जिनके सदस्य सादा कपड़ों में पुलिसकर्मी होते हैं-मुसलमान युवकों को निशाना बना रहे हैं। इस तरह की नैतिक पुलिस को राज्य का संरक्षण प्राप्त रहता है। (अगले अंक में जारी….)   अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

-एल. एस. हरदेनिया

 

 

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