Home » Editorial & Articles » यह हुब्बे हुसैन नहीं बुग़ज़े माविया है,वरना सांप्रदायिक और नास्तिक ही नहीं इंसानियत पसंद जनता भी आपको नकार देगी
यह हुब्बे हुसैन नहीं बुग़ज़े माविया है,वरना सांप्रदायिक और नास्तिक ही नहीं इंसानियत पसंद जनता भी आपको नकार देगी

यह हुब्बे हुसैन नहीं बुग़ज़े माविया है,वरना सांप्रदायिक और नास्तिक ही नहीं इंसानियत पसंद जनता भी आपको नकार देगी

ज़ायरा वसीम ने दंगल फिल्म में कुश्ती लड़ी नाम पैदा किया ,फतवों और मुख़ाल्फ़तों का दौर शुरू हुआ ,बहती गंगा में तारिक़ फ़तेह भी हाथ धो गए उन्होंने भी आग में घी डालने की पूरी कोशिश की , और अपने प्रोग्राम में ज़ायरा के मुद्दे को भी लेकर समुदाय को वर्गों में बांटने का काम किया ,बल्कि इसी मुद्दे पर समुदाय को लैंगिक आधार पर भी बांट दिया,यहाँ दरअसल ज़ायरा के साथ हमदर्दी या नफरत का मुद्दा नहीं था बल्कि एक विचार धरा और मज़हब के बीच नफरत की दीवार को ऊंचा करना मक़सद था !

ज़ायरा फिल्म की एक कैरेक्टर थी इससे पहले बहुत सी मुस्लिम महिलायें या लड़कियां फिल्मों में अपना किरदार अदा करती रही हैं ज़ायरा ही क्यों मुद्दा बनी, ,,,,इसलिए कि उन दिनों कश्मीर वैली में वहां का बहुसंख्यक ,और देश का अल्पसंख्यक वैली में पुलिस और फ़ौज की कार्रवाइयों से असंतुष्ट था वैली का अनरेस्ट केंद्र और मेहबूब की सरकार के लिए दर्द ए सर बनता जा रहा था ,बीजेपी समर्थन से बानी मेहबूब सरकार कि किरकिरी होरही थी वैली में अनरेस्ट था वहां सैकड़ों नौजवान पुलिस और आर्मी की गोलियों का शिकार होगया थे ,हज़ारों नाबीना (अंधे ) हो रहे थे जनता सड़कों पर थी तभी ज़ायरा को मुद्दा बना दिया गया ,देश की निगाह मुद्दे से हटा दी गयी ,वैली में क्यों हुआ नौजवानों का क़त्ल ,क्यों हुए हज़ारों आँखों से माज़ूर …कौन देगा जवाब और किसकी है इसकी जवाबदेही मसला सब ठन्डे बसते में ……

लेकिन सवाल आज भी कश्मीरियों के ज़ेहन में मौजूद है मासूमों की आँखों की रौशनी कौन लौटाएगा जिनको पैलेट गन से निशाना बनाया गया था ,क्या यह मानवाधिकार का हनन नहीं था ?

अब जो नाहीद आफरीन देश के सर्वोत्तम संगीत रियलिटी शो में नंबर 2 पर रही , 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी कॉलेज में 16 साल की नाहिद को एक बार फिर अपनी कला का लोहा मनवाना है ,उसको demoralise करने का काम शुरू होगया ,इससे पहले भी कई नाहीद देश में अपना झंडा गाढ़ चुकी हैं कभी किसी पर कोई फतवा न शरई पाबंदी ,ISIS के खिलाफ गीत का बहाना और उभरते सितारे को डुबोने की साज़िश ……

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि नाहिद ने हाल ही में आतंकवाद जिसमें आईएस आतंकी ग्रुप भी शामिल है, के खिलाफ कुछ गाने गए थे।याद रहे आफरीन के खिलाफ एक फतवा जारी किया गया है ताकि उसे लोगों के सामने गाना गाने से रोका जा सके। साथ ही कहा गया है कि वह गायन के पेशे को रोक दे क्योंकि यह शरीयत के खिलाफ है। ऐसे में पुलिस इस मामले की जांच इस दृष्टिकोण से भी कर रही है कि कहीं यह फतवा इस बात की प्रतिक्रिया तो नहीं,जिसमें ISIS जैसी आतंकी संस्था के खिलाफ गाना गाया गया है । एडीजी स्पेशल ब्रांच पल्लब भट्टाचार्य ने कहा कि हम इस ऐंगल से भी मामले की जांच कर रहे हैं।

अब यह मुद्दा राष्ट्रीय समाचार चैनलों में अपनी जगह बना चूका है ।उधर असम के मुख्यमंत्री ने फतवे की निंदा और आफरीन की सुरक्षा के लिए अपनी सरकार की प्रतिबद्धता की बात कही है । इस बीच,बदनाम ए ज़माना तस्लीमा नसरीन ने भी ट्वीट कर आफरीन के प्रति समर्थन जतायाहै जैसे इंतज़ार था उसको इस चर्चा का ।

रफ्ता रफ्ता मामले को सांप्रदायिक बना लिया गाया है जिससे एक उभरते सितारे को डुबोने का मौक़ा भी मिल रहा है दुसरे एक विशेष वर्ग को कट्टर कहकर और आतंकी गुटों का समर्थक बताकर ज़ुल्म और बेगुनाहों कि गिरफ्तारियों का नया सिलसिला भी शुरू किया जासकेगा।

सोलह साल की उम्र में नाहिद आफरीन देश के सबसे हाई प्रोफाइल वाले संगीत रियलिटी शो में दूसरे स्थान पर रही है और पूरे देश में प्रतियोगिताओं को गायन में कई पुरस्कार जीते हैं । उन्हें इस वर्ष कक्षा 10 में पदोन्नति भी मिली है। असम में एक साथ नामालूम 46 मौलानाओं ने 16 साल की एक होनहार गायिका के खिलाफ फतवा भी जारी कर दिया है। लेकिन अब यह तथ्य सामने आया है कि वो कोई फतवा नहीं था बल्कि आम लोगों द्वारा हस्ताक्षर किया गाया परचा था ।अलबत्ता कश्मीर के मौलाना रशीद के फतवे को बुन्याद बनाया जाना सही लगता है !

अगर इसको फतवा मान भी लिया जाए तो उन मौलवियों से हम पूछना चाहते हैं की क़ौम की बच्चियों और बच्चों को अगर वो 100 फीसद इस्लाम पर अमल करवाना चाहते हैं तो इसकी कोशिश मोहल्ला स्तर पर मदरसों , मकतबों और स्कॉलों से क्यों नहीं करते और ऐसा निज़ाम इ तालीम क्यों नहीं चलाते जिसमें ख़ुसूसन मुस्लिम समाज का हर फर्द इस्लाम के क़ानूनों का पाबन्द हो सके , अचानक मुस्लिम लड़कियों के परदे , तालीम ,लिबास ,गायन कला , कुश्ती और दीगर प्रतिस्पर्धाओं में नाम कमाने वाली मुस्लिम बच्चियों के खिलाफ फतवे और मुख़ाल्फ़तें कभी कभी साज़िश का हिस्सा नज़र आने लगते हैं ।हालांकि समाज में तेज़ी से गिरते नैतिक स्तर (अख़लाक़ी मेआर ) मुल्क ओ दुनिया के लिए चुनौती से कम नहीं ।

दूसरी ओर इस तरह सिर्फ गिनी चुनी मुस्लिम महिलाओं या लड़कियों के पक्ष में मज़हबी विद्वानों के खिलाफ सरकारों का समर्थ मुस्लिम समाज के साथ हमदर्दी नहीं बल्कि एक ख़ास विचार धारा (नज़रिये) के खिलाफ campeign नज़र आता है ,जिससे सांप्रदायिक सद्भाव को खतरा है ,जो किसी भी सूरत में न तो देश के हित में है और ना ही जनता के ।ऐसे में सरकारों को देश की तरक़्क़ी के लिए समान अधिकार भाव से सभी वर्गों और समुदायों के सान्सारिक विकास के लिए एकाग्रता से काम करना चाहिए और आस्था या धर्म को अवाम के ऊपर छोड़ देना चाहिए ।वो जिस आस्था या मज़हब पर चलना चाहें चलें हरेक को उसके संवैधानिक अधिकार के तहत आज़ाद छोड़ देना चाहिए ।

और अगर मज़हबी रहनुमाओं या फतवे जारी करने वाले विद्वानों को मुस्लिम महिलाओं और युवतियों के फ़ैशन , कुश्ती , नंगापन या फहाशी से लगता है कि यह समुदाय ,मज़हब या community के लिए अफ़सोस और शर्म कि बात है तो उसके लिए मुसलसल एक कोशिश हो जिसके माध्यम से वो community के बच्चों और बच्चियों में नैतिकता और सही इस्लाम का चलन ला सकें ।वर्ना अपनी लगन और अथक मेहनत के बाद इस तरह सांसारिक बुलंदियों पर पहुँचने वालियों और वालों को तो आपके फतवे और शरीयत के क़ानून मज़ाक़ ही दिखाई देंगे जिसके आप खुद ज़िम्मेदार होंगे शायद !लाखों नाहीद और ज़ायरा जैसी बच्चियों को शैतानी चुंगल से मिकालने लिए घर घर में हक़ ओ तौहीद ,रिसालत और आख़िरत कि मेहनत कि ज़रुरत है ,वरना सांप्रदायिक ,नास्तिक ही नहीं इंसानियत पसंद जनता भी आपको नकार देगी ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Scroll To Top